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‘एक मिनी कथा’ FILM REVIEW: एक ‘मिनी’ कथा में विषय बहुत ‘बड़ा’ चुना है

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एडल्ट कॉमेडी सुनकर ही दिमाग में ‘मस्ती’, ‘ग्रैंड मस्ती’ या ‘क्या कूल हैं हम’ जैसी फिल्मों की याद आ जाती है. इन फिल्मों को परिवार के साथ देखने का तो सवाल ही नहीं उठता, लेकिन कुछ-कुछ दृश्य तो इतने फूहड़ होते हैं कि आप अकेले भी देख रहे हों तो मन में घिन के सिवा कुछ और नहीं आता. इंग्लिश फिल्मों में सेक्स कॉमेडी या एडल्ट कॉमेडी से प्रभावित हो कर हिंदी फिल्मों की एक झड़ी लगी थी और वर्तमान में कुछ ओटीटी प्लेटफॉर्म तो सिर्फ इसी तरह से कंटेंट से भरे पड़े हैं. इस बीच अमेजन प्राइम वीडियो पर एक एडल्ट कॉमेडी रिलीज हुई- ‘एक मिनी कथा’. इस फिल्म की विशेषता है इसका विषय है, जो असल में एक बहुत बड़ा विषय है और उस पर परिवारों में या मित्रों में भी चर्चा कर पाना संभव नहीं है.

फिल्‍म का नाम- एक मिनी कथा (अमेजन प्राइम वीडियो)

रिलीज डेट- 27 मई, 2021

डायरेक्‍टर- कार्तिक रापोलूकास्‍ट- संतोष शोभन, काव्या थापर, श्रद्धा दास, कृष्ण मुरली पोसानी, ब्रम्हाजी और अन्य

म्‍यूज‍िक- प्रवीण लक्काराजु

जॉनर- एडल्ट कॉमेडी

रेटिंग- 2.5/5

ड्यूरेशन- 2 घंटा 14 मिनिट

प्रोड्यूसर- यूवी कॉन्सेप्ट्स, मैंगो मास मीडिया

राममोहन (ब्रम्हाजी) कॉलेज में प्रोफेसर हैं और उन्हें लगता है कि उनके बेटा “सेक्स एडिक्ट” है यानी उसके अंदर यौन भावनाएं काफी तीव्र है और इसी वजह से वो कई गलत काम करता है. राम मोहन एक साइकेट्रिस्ट डॉक्टर सत्य किशोर (कृष्ण मुरली पोसानी) के पास जाते हैं जो उनके बेटे संतोष (संतोष शोभन) को मिलने के लिए बुलाते हैं जहां उन्हें समझ आता है कि संतोष के मन में एक कुंठा है जहां उसे लगता है कि उसका यौनांग छोटा है. इस से निजात पाने के लिए वो कई तरह के नुस्खे आज़माता रहता है. इसी कड़ी में संतोष का दोस्त उसे एक कॉल गर्ल के पास ले जाता है और उसी समय पुलिस वहां छापा मार देती है. पुलिस केस की वजह से राम मोहन को अपने बेटे पर गुस्सा आता है और वो उसकी शादी अमृता (काव्या थापर) से तय कर देते हैं. समय के साथ दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं. अपनी कुंठा की वजह से संतोष ऑपरेशन करवाने का निर्णय ले लेता है लेकिन डॉक्टर की ऑपरेशन टेबल पर ही दिल का दौरा पड़ने से मौत हो जाती है और संतोष का प्लान फेल हो जाता है.

एक धार्मिक संगठन के गुंडे, वैलेंटाइन दिवस पर संतोष और अमृता को पार्क में देखकर जबरदस्ती उनकी शादी करा ही देते हैं और इसका लाइव टेलीकास्ट टीवी पर किया जाता है. संतोष अपने दिल की बात अमृता को तब भी नहीं बता पाता. दोनों अपनी शादी शुदा जिंदगी की शुरुआत करते हैं. संतोष का दोस्त एक सन्यासिनी (श्रद्धा दास) को लेकर आता है जो संतोष की समस्या का इलाज करने का दावा करती है. संतोष के ससुराल वाले उसी समय संतोष के घर आकर रहने लगते हैं और अमृता का रिश्तेदार वही इंस्पेक्टर होता है जिसने संतोष को गिरफ्तार किया होता है. ढेर सारे कन्फ्यूज़न के बीच अमृता के नाराज़ घरवाले संतोष की जेल यात्रा की कहानी सुनकर और सन्यासिन से उसके सम्बन्ध होने के इलज़ाम के बीच सम्बन्ध तोड़कर अमृता को संतोष के घर से ले जाते हैं. काफी प्रयासों के बाद भी मामला नहीं सुलझता तो एक दिन थक हार कर संतोष, अमृता के घर पहुंच कर लाउडस्पीकर पर सबके सामने अपनी समस्या का इज़हार करता है और अमृता से माफ़ी मांगता है. सभी सुखी कहानियों की ही तरह फिल्म का अंत सुखद होता है लेकिन एक गैर ज़रूरी मैसेज डाल कर कहानी को कुछ मायने देने की कोशिश भी की गयी है.

फिल्म की कहानी और डायलॉग लिखे हैं मेलरपका गांधी ने और पटकथा में उनका साथ दिया है शेख दाऊद ने. मेलरपका गांधी फिलहाल हिंदी फिल्म “अंधाधुंध” के तेलुगू रीमेक का निर्देशन कर रहे हैं. कहानी को कॉमेडी के तौर पर प्रस्तुत किया है. काफी हद तक सफल भी रहे हैं लेकिन इस चक्कर में पूरी फिल्म लम्बी हो गई है. ‘शुभ मंगल सावधान’ में जैसे प्रौढ़ावस्था में गर्भधारण की समस्या थी, ‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’ में गे वेडिंग की कहानी थी. कई साल पहले मुंबई मैटिनी में एक 32 साल के शख्स की कहानी थी जो अभी कुंवारा है. विक्की डोनर में स्पर्म डोनेशन जैसे संवेदनशील विषय को बड़े ही मज़ेदार तरीके से दिखाया गया है. एक मिनी कथा कुछ ऐसा ही करने का प्रयास करती नज़र आती है और प्रमुख कलाकारों के कमज़ोर अभिनय की वजह से कॉमेडी एक विचित्र पैरोडी बन जाती है और दर्शकों को असहज करती रहती है.

संतोष शोभन एक युवा अभिनेता है और बहुत कम फिल्में की हैं. अधिकांश दृश्यों में वो असमंजस में नज़र आते हैं. वो संभवतः ये निर्धारित करने की कोशिश कर रहे होते हैं कि उन्हें कॉमेडी करनी है या सीरियस लुक रखना है या एक बेचारे का रोल करना है. उनके चेहरे पर सीन के हिसाब से भाव नहीं आ पाते. विक्की डोनर जैसी फिल्म में आयुष्मान खुराना अपने अभिनय से बाज़ी मार ले जाते हैं, संतोष चूक जाते हैं. न उनकी बेचारगी पर तरस आता है, न ही जब वो किसी हास्यास्पद सिचुएशन में फंस जाते हैं तो हंसी आती है. अमृता के किरदार में काव्या थापर ने कोई विशेष अभिनय नहीं किया है. इतने संजीदा विषय की फिल्म में अभिनेत्री से अभिनय में थोड़ी संजीदगी की उम्मीद होती है लेकिन लेखकों ने इस बात पर गौर ही नहीं किया. संतोष के चतुर मित्र सुदर्शन (दर्शन) ने थोड़ी बहुत कॉमेडी की है और बार बार इसकी वजह से संतोष पर संकट आते हैं ये बातें थोड़ा हंसाती हैं. बाकी कलाकार अत्यंत साधारण हैं. किसी का अभिनय कोई छाप नहीं छोड़ता.

फिल्म के एडिटर सत्या जी. हैं. इन्होंने इस फिल्म को लम्बा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है. ये फिल्म मात्र 90 या 100 मिनिट में ख़त्म की जा सकती थी लेकिन कहानी को सीन दर सीन बढ़ने की लेखक और निर्देशक इस इच्छाओं ने इस फिल्म को एक टाइट फिल्म बनने से रोक दिया. एडिटर का काम बहुत ज़रूरी था. फिल्म के निर्देशक कार्तिक रापोलू की यह पहली फिल्म है. उनके काम में अनुभव की कमी नज़र आती है. अनावश्यक दृश्य और गाने, फिल्म की रफ़्तार को प्रभावित करते हैं. कुछ सीन पूरी तरह से हटाए जा सकते थे. गोकुल भारती की सिनेमेटोग्राफी भी सामान्य है. कई जगह कलर कंटिन्यूटी ठीक नहीं है.

फिल्म को परिवार वालों के साथ बैठकर देखने की भूल कतई न करें, शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है.



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