August 5, 2021

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ऐसे की जाती है कोविड की जांच, जानें क्‍या हैं LDH और D Dimer टेस्‍ट

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जैसे ही कोविड-19 (Covid-19) से ग्रस्त होने की बात पता चलती है, तो पहला सुझाव दिया जाता है RTPCR या एंटिजेन जांच का, ताकि कोविड है कि नहीं इसका पता चल जाए. मरीज़ की क्लीनिकल स्थिति क्या है इस आधार पर CBC, CRP, D Dimer, LDH, IL6, LFT, RFT, ब्लड शुगर के जांच (Test) की सलाह दी जाती है, ताकि मरीज़ का इलाज कैसा हो यह निश्चित किया जा सके. ऐसे में आपको इनकी जानकारी जरूर होनी चाहिए. आइए जानें इन जांचों के बारे में-

CBC

CBC/CBP का अर्थ है कंप्लीट ब्लड काउंट जिससे रक्त कोशिकाओं की बनावट में आए बदलावों को जाना जा सके. इनमे लाल रक्त कोशिका (RBC), श्वेत रक्त कोशिका (WBC), प्लेटलेट (थ्रोम्बोसाइट्स) शामिल हैं. संक्रमण के कारण रक्त कोशिकाओं में मात्रात्मक और इनके आकार में आए परिवर्तनों को समझा जा सकता है जिससे डॉक्टरों को मरीज़ के इलाज में मदद मिलती है.

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CRP

सी रिएक्टिव प्रोटीन यकृत (liver) में पाया जाने वाला रिएक्टेंट है. संक्रमण के कारण रक्त में CRP का स्तर बढ़ जाता है. बहुत ही तीव्र संक्रमण में जैसे कि डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन में इसमें मामूली रूप से वृद्धि होती है, जबकि गठिया और संक्रमणकारी गठिया में यह थोड़ा ज़्यादा बढ़ता है पर जब कोई बैक्टीरियल/वायरल/फ़ंगल संक्रमण होता है तो यह काफ़ी बड़ा हो जाता है.

D Dimer

सामान्य रूप से रक्त वाहिकाओं में रक्त का थक्का नहीं बनता, क्योंकि उसमें प्राकृतिक रूप से थक्का रोकने वाला रसायन मिला होता है. पर जैसे ही रक्त वाहिकाओं में गड़बड़ी पैदा होती है तो रक्त के क्षय को रोकने के लिए इसका थक्का बन जाता है. इसी तरह, अगर रक्त वाहिकाओं के अंदर रक्त का थक्का बनता है जो थक्का रोकने वाली व्यवस्था को सक्रिय करना पड़ता है ताकि रक्त वाहिकाओं से रक्त का बहना जारी रहे. थक्का को नष्ट करने पर जो कचरा तैयार होता है वह बहुत थोड़े समय के बाद निकल जाता है. बीमारी और संक्रमण के कारण रक्त वाहिकाओं में ज़रूरत से ज़्यादा थक्का बन सकता है और इसको दूर करने के लिए थक्के को हटाने का काम किया जाता है. इस वजह से रक्त में थक्के को नष्ट करने के बाद पैदा हुए कचरे की मात्रा बढ़ जाती है जो कि छोटी रक्त वाहिकाओं में फंस सकता है और इस वजह से मरीज़ की मौत हो सकती है. डी डाइमर थक्का को समाप्त करने वाला उत्पाद– फ़ायब्रिन है. रक्त में डी डाइमर का स्तर बढ़ने का मतलब है रक्त में ज़रूरत से ज़्यादा थक्का का बनना और इसलिए थक्का को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू करनी होती है, ताकि मरीज़ की जान बचायी जा सके.

LDH

लैक्टेट डिहाईड्रोजिनेज एक तरह का एंज़ाइम है जो शरीर की हर कोशिका में होता है. रक्त में इसका स्तर तब बढ़ता है जब शरीर में कोई संक्रमण होता है या कोई बीमारी होती है. कई बार काफ़ी ज़्यादा वर्जिस करने या कठिन गतिविधि के कारण भी शरीर में इसकी मात्रा बढ़ जाती है. किसी अंग विशेष में LDH का प्रकार उस अंग को हुई क्षति के बारे में बताता है. इससे डॉक्टर को इस अंग के बारे में आगे और जांच करने में मदद मिलती है ताकि इलाज जल्दी शुरू किया जा सके.

IL6

शरीर की इम्यूनिटी शरीर में इंटरल्यूकिंस-6 का स्राव करता है जो कि खुद और लिवर में CRP और फ़ायब्रिन जैसे रसायनों को बनाकर संक्रमण से लड़ता है. रक्त में IL6 का स्तर बढ़ने का मतलब है शरीर में संक्रमण का होना. यह एक ग़ैर-विशिष्ट मार्कर है क्योंकि गठिया और इसी तरह की अन्य बीमारियों के होने पर भी इसका स्तर शरीर में बढ़ता है. शरीर में इसकी मात्रा अधिक होने का पता चलने का मतलब है शरीर में ज़्यादा सूजन और इसलिए इस सूजन को कम करने की दवा, जैसे स्टेरॉयड दी जाती है ताकि कोशिका की रक्षा की जा सके.

LFT

यकृत (liver) कैसा काम कर रहा है इसकी जांच के लिए रक्त की जांच की जाती है, जैसे कि वह ऐल्ब्यूमेन जैसी प्रोटीन और रक्त में कचरे जैसे बिलीरूबिन को नष्ट करने के लिए रसायनों को बना रहा है कि नहीं. रक्त में प्रोटीन की कम मात्रा और एंज़ाइम की अधिक मात्रा होने का मतलब है लीवर का ठीक से काम नहीं करना. अगर LFT असामान्य है तो इसका मतलब हमेशा ही लीवर का ख़राब होना नहीं होता. यह संक्रमण या दवा लेने की वजह से भी हो सकता है.

RFT

गुर्दा (kidney) रक्त को साफ़ करता है और इसमें से कचरे को हटाता है जो पेशाब के रूप में हमारे शरीर से निकलता है. किडनी ठीक से काम कर रही है कि नहीं इस बात की जांच करने से ऐल्ब्यूमिन, यूरिया और क्रीऐटिनीन को फ़िल्टर किया जा रहा है कि नहीं यह पता चलता है. अगर इनकी मात्रा असामान्य है तो इसका अर्थ यह हुआ कि किडनी ठीक से काम नहीं कर रहा है. असामान्य RFT का मतलब यह नहीं है कि किड्नी की बीमारी है बल्कि ऐसा कई कारणों से हो सकता है जिसमें संक्रमण और दवा लेना भी शामिल है.

पेशाब की जांच

यह एक ऐसी जांच है जिसमें पेशाब का माइक्रोस्कोप से विश्लेषण किया जाता है जिसमें इसके रंग, इसमें पायी जानेवाली वस्तुओं और इसकी सांद्रता जांची जाती है. यह उपयोगी जांच है और इससे पेशाब नली में किसी तरह के संक्रमण, किड्नी की बीमारी या डायबिटीज़ का पता चलता है.

रक्त में चीनी की मात्रा की जांच

रक्त में चीनी की मात्रा की जांच मुख्य रूप से डायबिटीज़ के इलाज के लिए की जाती है. डायबिटीज़ के अलावा तनाव, संक्रमण और दवा, जैसे स्टेरॉयड लेने से भी रक्त में चीनी के स्तर में हेरफेर होता है.

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प्रो- कैलसीटोनिन जांच (PCT)

यह रक्त आधारित बायो-मार्कर है जिसका प्रयोग बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण में मरीज़ का शरीर किस तरह से प्रतिकिया करता है इसका पता चलता है. बैक्टीरिया का संक्रमण होने के तीन से छह घंटे के भीतर इसमें वृद्धि होती है और 12-24 घंटे के बाद यह शीर्ष पर होता है और फिर जैसे ही संक्रमण कम होता है यह घटने लगता है. वायरल संक्रमण में इसका स्तर नीचे बना रहता है. PCT द्वितीयक बैक्टीरियल संक्रमण को पकड़ने और बीमारी के आगे बढ़ने के बारे में जानने में मदद करता है. यह इस बात का पता लगाने में भी सहायक होता है कि स्टेरॉयड के प्रयोग के कारण WBC की संख्या में वृद्धि हुई है या किसी बैक्टीरियल संक्रमण की वजह से. PCT एक महत्त्वपूर्ण जांच है जिसके द्वारा यह निर्धारित किया जा सकता है कि मरीज़ को एंटीबायोटिक दिया जाए कि नहीं और इस तरह मरीज़ में ऐंटीबायोटिक के ज़रूरत से अधिक प्रयोग को नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि इसका अधिक प्रयोग एंटीबायोटिक प्रतिरोध पैदा करता है. कई अध्ययनों में पता चला है कि PCT यह बताने में सक्षम रहा है कि बीमारी गंभीर होने वाला है या इलाज का असर नहीं हो रहा है. इसकी मात्रा अगर 0.25 माइक्रोग्राम/लीटर है तो यह अच्छे परिणाम का सूचक है.

डॉ. निकेत राय/Dr Niket Rai

एसोसिएट प्रोफेसर

डिपार्टमेंट ऑफ फार्माकोलॉजी

मौलाना आज़ाद मेडिकल कॉलेज एवं लोकनायक अस्पताल

नई दिल्ली



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