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चीनी कंपनियों पर सरकार नरम, अब पब्लिक प्रोजेक्ट के लिए लगा सकेंगी बोली

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नई दिल्ली. देश में अब फिर से चीनी कंपनियां पब्लिक प्रोजेक्ट के लिए बोली लगा सकेंगी. सरकार ने घरेलू कंपनियों को सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए बोली लगाने के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों (technology transfer agreements) के माध्यम से चीनी कंपनियों के साथ साझेदारी करने की अनुमति दी है.

Chinese firms के संबंध में सरकार के रुख में यह एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है. पिछले साल दोनों देशों के बीच बढ़े हुए सीमा तनाव के बाद देश में चीनी फर्मों को व्यापार करने से हर संभव तरीके से रोकने की कोशिश की गई थी.

जुलाई में सीमा तनाव के बाद बदले थे नियम 

जुलाई 2020 में, सीमा तनाव के नतीजे के रूप में, सरकार ने अपने सामान्य वित्तीय नियमों (जीएफआर) में संशोधन किया था. इसके तहत कहा गया था कि भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले किसी भी देश के बोलीदाताओं को सरकारी प्रोजेक्ट के लिए पात्र होने के लिए पहले “सक्षम प्राधिकारी” के साथ पंजीकरण करने की आवश्यकता है.यह भी पढ़ें-  नए Income Tax Portal में आ रही परेशानी को लेकर 22 जून को वित्त मंत्रालय और Infosys के बीच होगी बैठक

हालाँकि, भारत ने उन देशों के बोलीदाताओं के लिए छूट का भी प्रावधान किया था जहां वो development projects में काम कर रही है. इस तरह नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे देशों को स्वत: छूट मिल गई. साथ ही, यह स्पष्ट हो गया कि यह आदेश चीन से संबंधित फर्मों के लिए था, क्योंकि पाकिस्तान में स्थित कंपनियां सरकारी अनुबंधों में भाग नहीं लेती हैं.

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इस महीने की शुरुआत में नियमों में हुआ बदलाव

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस महीने की शुरुआत में, ministry of finance, व्यय विभाग के खरीद नीति विभाग ने इस संबंध में एक office memorandum जारी किया. इसमें कहा कि, “बोलीदाताओं के लिए भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देश की संस्थाओं के साथ टीओटी (प्रौद्योगिकी हस्तांतरण) व्यवस्था करने पर कोई रोक नहीं है। इसलिए, ऐसे बोलीदाताओं को सक्षम प्राधिकारी के साथ पंजीकृत होने की आवश्यकता नहीं है।”

सूत्रों ने कहा कि इसमें छूट की आवश्यकता थी

आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि इसमें छूट की आवश्यकता थी, क्योंकि सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए बोली लगाने वाली बहुत सी भारतीय फर्मों ने चीनी फर्मों के साथ कुछ प्रौद्योगिकी साझाकरण समझौते ( technology sharing pacts) किए हैं, खासकर infrastructure sectors  में. नतीजतन, संबंधित प्रशासनिक मंत्रालयों ने वित्त मंत्रालय से स्पष्टीकरण मांगा था कि क्या ऐसे बोलीदाताओं को निविदाओं में भाग लेने या अयोग्य घोषित करने की आवश्यकता है.

सूत्रों ने कहा कि चूंकि भारतीय कंपनियों द्वारा अपने चीनी समकक्षों को शुल्क के भुगतान पर technology transfer किया जाता है और निष्पादन फर्म (executing firms) भारतीय हैं, इसलिए ऐसी रियायतें दी जा सकती हैं.

उद्योग के सूत्रों ने कहा कि छूट अब चीनी फर्मों को भारत में व्यापार करने की कुछ गुंजाइश प्रदान करती है. पिछले साल की शुरुआत के बाद से, सरकार ने चीनी कंपनियों के प्रति सख्त रुख अपनाया था और सभी चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया था. हुआवेई और जेडटीई जैसे टेलीकॉम गियर निर्माताओं को राज्य के स्वामित्व वाली बीएसएनएल या यहां तक ​​कि निजी क्षेत्र के दूरसंचार ऑपरेटरों के लिए नेटवर्क बनाने की अनुमति नहीं दी थी.





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