September 22, 2021

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जांबाजी और प्रेम

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करगिल युद्ध के एक हीरो परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन पर बनी यह फिल्म अमेजन ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई है। यह देश के लिए लड़ते हुए मर-मिटने की भावना पर आधारित है लेकिन इसमें एक प्रेम कहानी भी है। और हां, शुरू में ही यह बता दिया जाए कि इसका नाम ‘शेरशाह’ इसलिए है कि सेना में यही विक्रम बत्रा का ‘कोडनेम’ या उपनाम था। स्वतंत्रता दिवस यानी पंद्रह अगस्त के मौके पर रिलीज होनेवाली यह फिल्म लगभग बाइस साल पहले हुए उस वाकये पर आधारित है जब पाकिस्तानी सेना भारतीय सीमा के भीतर धोखेबाजी से प्रवेश कर गई थी और उसे बाहर निकालने के लिए भारत ने जंग लड़ी, जिसमें कई सैनिक शहीद हुए।

सिद्धार्थ मल्होत्रा ने इसमें कैप्टेन बत्रा उर्फ शेरशाह की भूमिका निभाई है। कैप्टेन बत्रा का जन्म हिमाचल में हुआ था। बत्रा को सेना में जाने के पहले इश्क भी हुआ था डिंपल (कियारा आडवाणी) नाम की लड़की से। डिंपल सिख है और बत्रा पंजाबी हिंदू। डिंपल के पिता को यह मंजूर नहीं कि उसकी बेटी दूसरे धर्म वाले से शादी करे। लेकिन डिंपल प्रेम से डिगती नहीं है। विक्रम पहले मर्चेंट नेवी में जाना चाहता है लेकिन फिर सेना में चला जाता है और वहां लेफ्टिनेंट के पद पर उसकी पहली नियुक्तिहोती है। इस दौरान वो एक आतंकवादी गिरोह से भिड़ता है और उसका सफाया भी करता है। फिर आता है करगिल युद्ध, जिसमें विक्रम अपनी बाजी दिखाता है।

विक्रम और डिंपल का प्रेम फ्लैशबेक में दिखाया गया है। फिल्म की कहानी मुख्य रूप से विक्रम के सैन्य जीवन पर है और निर्देशक की पूरी कोशिश एक सैनिक की वीरता और बलिदान को दिखाने की है ताकि दर्शक भावना के स्तर पर अपने भीतर उबाल महसूस करे। सिद्धार्थ मल्होत्रा की बेहतरीन अदाकारी ने इसे संभव भी कर दिखाया है। ये उनका अब तक का सबसे अच्छा रोल है। कियारा आडवाणी भी जब तक स्क्रीन पर रहती है दर्शकों को बांधे रखती है। फिल्म में गाने भी हैं लेकिन वे सामान्य ही हैं। लेकिन जिस तरह से ‘विक्रम कथा’ कही और दिखाई गई है उसमें कहीं ढीलापन नहीं है। करगिल की पहाड़ियों का फिल्मांकन भी जबर्दस्त है।

फिल्म में कुछ असंगतियां भी हैं। जैसे विक्रम मर्चेंट नेवी में जाने की जगह सेना की नौकरी क्यों पसंद करता है,यह साफ नहीं होता। ऐसी ही कुछ और बातें भी हैं। पर इन सबके बावजूद ‘शेरशाह’ यादों में बसने वाली फिल्म है। एक युद्ध-फिल्म के रूप में ये जेपी दत्ता की फिल्म ‘एलओसी करगिल’ की याद दिलाती है जो करगिल युद्ध पर ही बनी थी। हालांकि दोनों फिल्मों का ट्रीटमेंट अलग-अलग है। निर्देशक विष्णु वर्धन की यह पहली हिंदी फिल्म है और इसके साथ ही उन्होंने हिंदी फिल्म उद्योग में धमाकेदार इंट्री मारी है।

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