August 5, 2021

NEWS NOW

ALL NEWS Just ON ONE CLICK

झूलों में पेंगे बढ़ाते, मैंने आकाश छुआ बहुत बार

1 min read
Spread the love


पेशे से वकील चित्रा देसाई (Chitra Desai) जितनी मुस्तैदी से अपने मुवक्किल के पक्ष में कानून के पेचीदगियों को रखती हैं उतनी ही कुशलता से वे भावना, संवेदना और संवाद को शब्दों में पिरोने का काम भी करती हैं. उनकी कविताएं आपको कभी गांव की डगर पर ले जाती हैं तो कभी खेत में खिली सरसों के बीच लाकर खड़ा कर देती हैं.

चित्रा देसाई भले ही मायानगरी मुंबई में रहती हों, घर में माहौल फिल्मी हो, मगर उनकी कविताओं के केंद्र में गांव, खेत-खलिहान की पगडंडियों से गुजरते चरित्र हैं. उनकी कल्पना और संवेदनशीलता पाठक के सामने ऐसा घटनाक्रम पेश करती है जिसे एक आम आदमी की आंखें शायद ही कभी देख पाएं.

‘तैनाल’ लगवाने की पुकार में वह घोड़े के पैरों में ठुकती नाल के दर्द को महसूस करती हैं. यह संवेदनशीलता चित्रा देसाई के अलावा आप हिन्दी के महान हस्ताक्षर धूमिल की कविताओं में देखते हो, जिन्होंने लिखा है- ‘लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो उस घोड़े से पूछो जिसके मुहं में लगाम है.’

‘धरती अगर संन्यासी हो जाए’ कविता में वे टूटते समाज के लिए आत्मीयता के महत्व को बहुत ही मार्मिक ढंग से रखती हैं.

कुछ ऐसे ही अनुभव महसूस कराने के लिए आपको ले चलते हैं चित्रा देसाई की कुछ कविताओं (Chitra Desai Poems) के पास-

धरती अगर संन्यासी हो जाए

कभी सोचा है —

धरती अगर संन्यासी हो जाए

तो कैसा हो !

बीज रोपें —

तो भी पेड़ न दे

कुदाली से खोदे

तो पानी न दे

समुद्र न बने

बादल न बरसे

इसके भीतर का महासागर

और देह का जंगल

भीतर ही सिमट जाए

तो कैसा हो…..!

ये सोचते ही —

मैं सुन्न होने लगती हूं

और….अंजुरी में मिट्टी भर

माथे से लगा लेती हूं.

कहते हैं ——

आत्मीय स्पर्श

किसी को संन्यासी नहीं बनने देती.

कभी सोचा है ……

मैंने आकाश छुआ बहुत बार

कार्तिक महीने में-

कुएं की मुंडेर पर बैठ

सुबह का तारा देखते हुए

मैंने अनगिनत कथाएं सुनी हैं.

फागुन में-

मैंने रिश्तों को

गुलाल लगाते

रंगे हाथों पकड़ा है बहुत बार.

बैसाख में-

गेहूं की बाल तोड़ते

सूरज से तपती धरती को

चटकते देखा कितनी बार.

सावन में-

आंगन के बीच

गहराये नीम के नीचे

झूलों में पेंगे बढ़ाते

मैंने आकाश छुआ बहुत बार.

छोटी उम्र के ये अनुभव

मुझे आज भी आश्वस्त करते हैं

कि जेठ की तपती धूप में

ज्यादा दिन नहीं तपोगी

क्योंकि इसके तुरंत बाद

सावन बरसते हैं.

‘तैनाल’ लगवाने की पुकार

सुनाई देती थी गलियों में

‘तैनाल’ लगवाने की पुकार

नर्म खुरो के नीचे-

लोहा जड़ते

देखा है कभी?

कहीं आवेश में –

आक्रामक न हो जाये,

मुंह पर बांध दी जाती है जाली.

स्वयं को सुरक्षित कर,

शुरू होती है—

यातना-कथा.

रेत में कुलबुलाती है पूरी देह,

ज़मीन पर पटकता है सींग,

जबड़ों के बीच दबी रबड़,

और बहता झाग!

आंख बंद कर—

राह देखती हूं उसके उठने की.

तैनाल लगा—–

दौड़ता है वह

तारकोल की सड़कों पर.

समझ जाती हूं—-

यात्रा के लिये

नर्म फोहो के नीचे

लोहा लगाने की प्रक्रिया

और मैं भी तैनाल लगवा-

उठ खड़ी होती हूं

सरपट दौड़ने के लिये.

बारिश पर पहला अधिकार

पनपती हैं जड़ें

धुलते हैं पत्ते

धुलते हैं पत्ते…..

बौराता है-

सृष्टि का हर कण !

पर-

बारिश पर पहला अधिकार

धरती का होता है

जैसे तुम पर मेरा.

चित्रा देसाई (Chitra Desai Profile)

चित्रा देसाई चर्चित लेखिका हैं. आपके लेख व कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहे हैं. आपके काव्य संकलन ‘दरारों में उगी दूब’ (Dararon Mein Ugi Doob) और ‘सरसों से अमलतास’ (Sarson Se Amaltas) काफी चर्चित रहे हैं.

चित्रा देसाई विदेश मंत्रालय में हिंदी सलाहकार समिति, बार्कलेज इंडिया की सलाहकार समिति की सदस्य भी रही हैं. आपको सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कार, नेपाली गीत पुरस्कार और स्वयंवर पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.



#झल #म #पग #बढत #मन #आकश #छआ #बहत #बर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *