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पुण्यतिथि : हिंदू से मुस्लिम बनी वो लेखिका, जिसने हिंदुओं को किया खफा, हुए धरना-प्रदर्शन

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कमला दास, अंग्रेजी की जानी मानी कवियित्री और लेखिका थीं. लेकिन ऐसी विद्रोही महिला, जिन्होंने अपने विचारों से सनसनी मचा दी थी. उन्होंने जिस तरह हिन्दू धर्म के कुरीतियों और महिलाओं की स्थिति को लेकर प्रहार किए, उससे दक्षिण पंथी संगठन बहुत आहत हुए. बाद में जब 65 साल की उम्र में उन्होंने मुस्लिम धर्म अपनाया तो पूरा देश सन्न रह गया.

कमला दास हिन्दू घर में पैदा हुईं. उनका नाम माधवी कुट्टी था. लेकिन अंग्रेजी साहित्य में उनकी पहचान बनी कमला दास के रूप में. 1999 में उन्होंने जब अपना धर्म बदला, तो इससे बड़ा विवाद हुआ. हालांकि इससे भी ज्यादा सनसनी वह आत्मकथा “माई स्टोरी” से पहले भी मचा चुकी थीं. जब उन्होंने मुस्लिम धर्म अपनाया और जो टिप्पणियां कीं, उससे विश्व हिंदू परिषद से लेकर कई दक्षिण पंथी संगठन बहुत कुपित हुए. उनके खिलाफ उग्र धरना प्रदर्शन होने लगे. उन्हें पुलिस सुरक्षा लेनी पड़ गई.

कमला दास 31 मार्च 1934 को केरल के पुण्याउर्रकुलम में पैदा हुईं. 31 मई 2009 को पुणे में उनका निधन हो गया. लेकिन वो अपनी जिंदगी में विवादों में ज्यादा रहीं.

प्यार के लिए बदला धर्मकनाडा के लेखक मेरिल वीजबोर्ड ने अपनी किताब “लव क्वीन ऑफ मालाबार” में लिखा कि उन्होंने धर्म इसलिए बदला क्योंकि उन्हें एक मुस्लिम नेता से प्यार हो गया था. शादी के लिए धर्म बदला और वो सुरैया बन गईं लेकिन वो मुस्लिम नेता फिर पीछे हट गया.

विवादों में घिरी फिल्म

कमला दास पर “आमी” नाम से एक फिल्म भी बनाने की घोषणा हुई लेकिन उससे पहले ही ये विवादों में घिर गई. मामला केरल हाईकोर्ट में है. आरोप है कि फिल्म में लव जेहाद को उचित ठहराया जा रहा है. पहले विद्या बालन इसमें काम करने वाली थीं लेकिन शूटिंग से पांच दिन पहले ही ये कहकर फिल्म छोड़ दी कि उन्हें कमला दास के बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं और वो डायरेक्टर के दृष्टिकोण से भी सहमत नहीं.

कमला दास ने अपनी आटोबॉयोग्राफी में कुछ ऐसी टिप्पणियां की, जिससे हिंदू नेता उनसे नाराज हो गए. इसके खिलाफ प्रदर्शन भी हुए. उनकी आत्मकथा को भारतीय आत्मकथा लेखन में काफी बेबाक माना जाता है.

महिलाओं के हक में आवाज उठाने वाली लेखिका

आजादी से पहले के दौर में कमला दास को महिलाओं के हक उठाने वाली लेखिका के रूप में माना जाता है. वह मलयालम के साथ अंग्रेजी में लिखने में सिद्धहस्त थीं. अपने मलयायम पाठकों के लिए वो माधवी कुट्टी के नाम से लिखती थीं तो अंग्रेजी में कमला दास के रूप में. खासकर देश में कविता के क्षेत्र में उनका योगदान गजब का है. उन्हें आधुनिक भारतीय अंग्रेजी कविताओं की मां भी कहा जाता है. विदेशों में उन्हें पसंद करने वालों की तादाद खासी है.

साहित्य की पहचान वाला परिवार

कमला मालाबार में उस घर से ताल्लुक रखती थीं, जिसकी लिटरेरी परिवार के रूप में पहचान थी. उनकी मां बालामनी अम्मा जानी मानी कवियित्री थीं तो ग्रैंड अंकल नालापत नारायन मेनन सम्मानित लेखक. वह केवल 06 साल की उम्र में पत्रिकाओं के लिए लिखने लगीं. ये डॉल्स को लेकर सैड कविताएं होती थीं. उन कविताओं पर उनका भाई चित्र बनाया करता था.

पति को शुरू में अच्छा नहीं लगा लिखना

उनकी शादी 15 साल की उम्र में रिजर्व बैंक में काम करने वाले माधव दास से हुई. वह बाम्बे आ गईं. लेकिन पति को उनका लेखन पसंद नहीं था. उसे लगता था कि बेहतर है कि वो मां और पत्नी के दायित्व ही निभाती रहें. ये जिम्मेदारियां ज्यादा बड़ी हैं.

उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा, “महिला चाहे कुछ भी बन जाए लेकिन उसे महिला होने के नाते अच्छी पत्नी और अच्छी मां के रूप में ज्यादा प्रूफ करना होता है. और इसका मतलब होता है सालों साल इंतजार में बिताते रहना. लेकिन मेरे पास इंतजार करने के लिए इतना समय नहीं था. मैं इतना धैर्य नहीं रख सकती थी. इसलिए मैने चुपचाप लिखना शुरू किया.”

Kamala das, india poetess

कमला दास की शादी माधव दास से हुई, जो उनके लेखन को कतई पसंद नहीं करते थे लेकिन बाद में जब उनके लेखन से आमदनी होने लगी तो पति का एतराज खत्म हो गया.

जब लेखन से आमदनी होने लगी तो एतराज खत्म हो गया

बाद में जब इससे उन्हें आमदनी होने लगी तो फिर उनके पति को होने वाला एतराज खत्म हो गया. उन्होंने लिखा, ” मैं अपने घर, बच्चों और किचन के काम के बाद पूरी रात जागकर लिखती रही थी. इसका असर मेरी हेल्थ पर भी पड़ा. उन्होंने कविताओं के जरिए महिलाओं के दर्द, अहसासों, भावनाओं और एक मानव होने को आवाज दी. ये जताया कि महिलाएं भी पुरुषों सरीखी ही हैं.”

कविता ‘खिड़की का शोक’

उनकी कविता एक खिड़की का शोक में उन्होंने पुरुष वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं की फीलिंग दी

“ऐसा हमेशा से होता रहा है

ये किसकी दुनिया है, जो मेरी नहीं

मेरा पुरुष मेरे बच्चे बस यही धुरी

मैं कहां, मां और पत्नी के बीच

पहना दिया गया है उनकी आंखों पर चश्मा”

मैने शर्ट पहनी और बाल कटा दिए

उन्होंने जेंडर भूमिकाओं पर भी गहरी नाराजगी जताई. लगातार इसे तोड़ने के लिए आवाज उठाती रहीं. उन्होंने आत्मकथा में लिखा, “तब मैने एक शर्ट पहनी और साथ में ब्लैक सारोंग. मैने अपने बाल छोटे कटवा दिए और महिलाओं को लेकर बोली जाने वाली तमाम उन लाइनों को किनारे खिसका दिया.” जब उनका परिवार वित्तीय दिक्कतों से गुजरा तब वह कॉलमिस्ट बन गईं, क्योंकि इसमें ज्यादा बेहतर पैसे मिलते थे.

कविताएं पीछे खिसक गईं. वह ‘मलयालांडु’ वीकली के लिए नियमित लिखती रहीं. अपने महिला होने के अनुभवों को शेयर करती रहीं. ये कुछ ऐसा था जो एकदम नए तरह का था. उनके पिता तब “मरुभूमि” समाचार पत्र ग्रुप में ताकतवर स्थिति में थे. उन्होंने संपादक पर दबाव बनाया कि कमला के कॉलम को बंद कर दिया जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

आत्मकथा ‘माई स्टोरी’

वर्ष 1973 में उनकी आत्मकथा ‘एंते कढा’ (माई स्टोरी) मलयालम में जारी हुई. जो राज्य में सनसनी बन गई. पंद्रह साल बाद इसके अंग्रेजी में ट्रांसलेशन हुआ और इसमें कुछ और चैप्टर जोड़े गए. समीक्षकों ने इसे ईमानदारी से लिखी गई आत्मकथा कहा. एक महिला के अंदर से निकली सच्ची आवाज. इस किताब में उनके समाज में व्यक्तिगत के साथ प्रोफेशनल अनुभव थे. पहली बार किसी महिला लेखिका ने रजोधर्म, यौवन, प्यार, वासना, लेस्बियन एनकाउंटर, बाल विवाह, बेवफाई और शारीरिक संबंधों पर लिखा. उन्होंने फीमल सेक्सुअलिटी पर लिखा.

साहित्य में काम

उन्होंने साहित्य जगत में भी गजब का काम किया. अंग्रेजी में उन्होंने नॉवेल ‘अल्फाबेट ऑफ लस्ट’ (1977), शार्ट स्टोरीज पर ‘पद्मावती द हर्लेोट एंड द अदर स्टोरीज’ लिखी. ‘समर इन कोलकाता’ (1973) कविताओं की किताब है. मलयालम में भी कई किताबें लिखीं. उन्हें कई अवार्ड भी मिले. लेकिन मोटे तौर पर कमला दास को भारतीय लेखन क्षेत्र की सबसे बोल्ड और विद्रोही महिला के तौर पर याद किया जाता है.

सियासी पार्टी भी बनाई 

हालांकि वो कभी सियासी तौर पर सक्रिय नहीं रहीं लेकिन उन्होंने बेसहारा मांओं को संरक्षण देने और सेकुलिज्म को बढ़ावा देने के लिए लोकसेवा पार्टी बनाई थी. 1984 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन हार गईं.

निधन कैसे हुआ

पुणे के एक प्राइवेट हास्पिटल में सांस से जुड़ी बीमारियों के चलते उनका 76 साल की उम्र में निधन हो गया. उनके दो बेटे हैं. उनका शव उनके गृह राज्य केरल ले जाया गया. तिरुअनंतपुरम की पालायम जुमा  मस्जिद में उन्हें पूरे सम्मान के साथ दफना दिया गया.





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