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पुरानी दिल्ली कि वो खिड़की जो बात करती थी…

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दिल्ली बदल गयी है. ग़ालिब की वो पुरानी दिल्ली कुछ और थी जो सादा-तरीन लोगों का गहवारा हुआ करती थी. बल्लीमारान से चितली क़ब्र तक अलग-अलग बाज़ारों और बैठकों की मुख़्तलिफ़ शक्लें थीं. गली क़ासिम जान के नुक्कड़ से जब चोग़ा पहने वो ख़मीदा पुश्त शायर गुज़रता था तो लोग अहतरामन ताज़ीम से झुक जाते थे कि जैसे उन गलियों से होकर तारीख़ गुज़री है.

उन बोसीदा सी गलियों से परवरिश पाई हुई तहज़ीब ने दिल्ली को दिल्ली बनाया. बैठकों से हुक्कों की गुड़गुड़ाहट और सजे हुए चिलमनों से तबलों के साथ जिस उर्दू ज़बान को दुनिया ने जाना. उसकी तहज़ीब और तमद्दुन का बाब, बाब-ए-जावेदां है.

इसी दिल्ली को मैंने पढ़ा था और इसी तस्वीर को लेकर मैं उस पुरानी दिल्ली में जाकर आबाद हो गया. ये उन दिनों की बात है, जब डिज़ाइनिंग की शुरुआत ही की थी. और कुछ महीनों के लिए पुरानी दिल्ली में जाकर बस गया. गली क़ासिम जान से मटिया महल तक सैकड़ों गलियों से होकर गुज़रता, लेकिन उस दिल्ली को कहीं ना पाया जिसको मैं जानता था.

गलियों में हलीम और बिरयानियों की ख़ुशबू उसी तरह महफ़ूज़ थी कि जैसी ख़ुशबू तारीख़ के उन सफ़हात में महसूस करता रहा था. बकरियों के मिमियाने की आवाज़ें भी कहीं-कहीं उसी तरह सुनाई देती थीं. लेकिन इन लोगों को क्या हुआ है? मैं सोचता कि सारी दुनिया को उर्दू सिखाने वाले ये लोग ख़ुद कौनसी ज़बान बोलने लगे हैं? जिसमें ना वो दैरीना लताफ़त है वो मदहोश कर देने वाली वारफ़्तगी, कि जो इंसान को इंसान के क़रीब लाती है. सिकुड़ी-सिमटी इन गलियों में बसने वाला मआशरा अब दूर-दूर बसता है. राह चलते हुए कोई किसी अनजान को सलाम करे तो सुनने वाला चौंक उठे कि ये अदब-ओ-आदाब अब क़िस्सा-ए-पारीना हुए.

दौर-ए-जदीद की इस पुरानी दिल्ली में एक चीज़ जो रूह को गरमाती थी, वो थी उन पुराने घरों और दालानों की वो खिड़कियां, जो गली तंग होने के बाइस अपने-अपने मकानों में, मगर दूसरों के मकानों में खुलती थीं. जिन खिड़कियों ने उस टूटते-बिखरते मआशरे को क़रीब ला दिया था. मैं सोचता, कि ये लोग अपनी फ़ितरत भूल गए हैं लेकिन ये खिड़कियां अपनी फ़ितरत पर आज भी क़ायम हैं. ये आज भी उन्हीं बैठकों में बैठी उस पुरानी दिल्ली की तरह नज़र आती हैं कि जहां हमसाये की ख़ुशी और ग़म में शरीक ना होना भी एक गुनाह था.

आज, जबकि इस बात को तक़रीबन 14-15 बरस गुज़र चुके हैं, मैं याद करने लगा हूं मेरे कमरे की उस खिड़की को, जिसके ठीक सामने की खिड़की इस तरह खुलती थी कि दोनों खिड़कियों का फ़र्क़ ही ख़त्म हो जाता. रोज़ाना शाम ढले खुलती. खिड़की के उस तरफ़ का मंज़र इस तरह दिखायी देता कि जैसे मेरे कमरे में कोई तस्वीर आवेज़ा हो.

उस ज़िंदा-ओ-जावेद तस्वीर का वो मंज़र नहीं भूलता. खिड़की से उस तरफ़ के कमरे की एक दीवार नज़र आती, जो हल्के फ़िरोज़ी रंग के चूने से रंगी थी. दीवार पर ख़राद की हुई लकड़ी की एक खूंटी थी, जिस पर एक उर्दू कैलेण्डर के साथ अक्सर एक लेडीज़ पर्स टंगा होता. उसके बराबर में लकड़ी की एक तख़्तेनुमा अलमारी थी, जिसके दायीं सम्त कुछ किताबें और बायीं सम्त पीतल और कांच की कटोरियां तला-ऊपर रखी थीं. कमरे में अंधेरा सा रहता. पीला, मगर कम रौशनी वाला बल्ब शायद दूसरी दीवार पर था. कमरे से शाम के वक़्त कुछ बच्चों के पढ़ने की आवाज़ें आतीं. लेकिन नीचे बैठे होने के सबब बच्चे नज़र ना आते.

इस पूरी तस्वीर में रंग भरता वो ज़रा किताब में झुका हुआ सा दिलगुदाज़ चेहरा. वो खिड़की से बिलकुल इस तरह लगी हुई बैठती कि खिड़की के पर्दे और कान से निकल कर चेहरे को छूती ज़ुल्फ़-ए-परेशां और शाम की कम रौशनी में वो चेहरा तस्वीर के उस आख़िरी स्ट्रोक की मानिंद नज़र आता कि जिसके बिना मुसव्विर के तख़य्युल की तकमील मुमकिन नहीं.

उस तस्वीर के ज़हूर का एक मख़सूस वक़्त था. फ्रे़म में कभी कुछ ना बदलता. कभी लिबास ही तब्दील हुआ होगा. लेकिन लिबास तो कोई भी ज़ैब-ए-तन हो, सबों का हाल ‘हसरत’ के उस मिसरे का सा हुआ- ”रंगीनियों में डूब गया, पैरहन तमाम”

चेहरा वही, आधा छुपा सा. जिसको शायर ने कहा था कि ”साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं.”

मैं कई महीने वहां रहा. लेकिन कभी उसे नज़र उठा कर उधर देखते नहीं देखा. हालांकि कई बार महसूस हुआ कि वो दो आंखें (जो ग़ालिबन क़यामत की सूरत रही होंगी) इस तरफ़ देख रही हैं. और ये भी देख रही हैं कि कोई देखता ना हो.

आख़िरी दिन जब आने लगा तो सामान को हाथ में उठा कर चलने ही वाला था कि ख़याल आया, रुक गया. नज़र उठा कर उधर देखा. एक चेहरा, किताब में झुका हुआ. मैं देखता रह गया. उसने आहिस्ता से नज़र उठाई. मुझे यूं सामान के साथ देखा तो समझ गयी. उसने सीधी बैठे हुए इस तरह हैरानी से देखा कि जैसे एक हूक के साथ किसी मंज़र से सामना हुआ हो. होंठ ज़रा खुले से, चेहरा ज़रा ज़र्द सा और आंखें…!! कितने सारे सवाल एक साथ लिए हुए. क्या कहता…? चला आया.

– शुऐब शाहिद



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