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प्रिय सुशांत, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…

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सुशांत (Sushant Singh Rajput) हम तुम्हारी तकलीफ तुम्हारी तनहाई नहीं समझ सकते हैं, ना पहले समझे हैं ना आगे कभी समझ पाए. जब तुम्हारी मौत की ख़बर आई तो सब डिप्रेशन पर बहस करने लगे, हर कोई डिप्रेशन का एक्सपर्ट बन गया. जिसे देखो वो डिप्रेस लोगों की मदद करने की बात करने लगा. लेकिन ये संवेदनशीलता बहुत दिन तक चलती नहीं है.

Source: News18Hindi
Last updated on: June 14, 2021, 2:36 PM IST

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डियर सुशांत,

उम्मीद है तुम उस खूबसूरत सितारों की दुनिया में खुश होगे. ये वही सितारों की ग्रहों की दुनिया है जहां तुम घूमना चाहते थे और आज तुम खुद एक सितारा बनकर वहां मौजूद है. तुम्हारी अदाकारी, मासूमियत की मैं कायल थी सोचा था कभी एक ख़त ज़रूर लिखूंगी जो शायद तुम तक पहुंच भी जाए. लेकिन कभी ये ख्बाव में भी नहीं आया कि अपने चहेते कलाकार को यूं ख़त लिखा जाएगा. मुझे नहीं पता कि तुम अब भी हमें सुन पा रहे हो या देख पा रहे हो या फिर खो गए हो उस दुनिया से जिसका वास्ता इस ज़ालिम दुनिया से नहीं है. फिर भी आज तुम्हें ये ख़त लिखने से रोक नहीं पाई. मैं दुआ करती हूं कि तुम उस बेहद हसीन दुनिया में खुश रहो जहां झल, कपट, झूठ, बेइमानी नहीं है. जहां रिश्तों में फ़रेब नहीं है, जहां लालच नहीं है.

प्रिय सुशांत आज तुम्हें इस दुनिया से गए हुए एक साल हो गया है. एक बार फिर तुम ट्वीटर पर ट्रेंड कर रहे हो, तुम्हारे लिए इंसाफ़ मांगा जा रहा है, तुम्हारी मौत को भुनाया जा रहा है, किसी को निचा दिखाने के लिए. मुझे ये बताते हुए बेहद तकलीफ़ हो रही है कि तुमने जब ये दुनिया छोड़ी तो उसके बाद से तुम्हें इंसाफ़ दिलाने या तुम्हारी जान देने की वजह जानने से ज़रूरी मीडिया को तुम्हारा तमाशा बनाना ज़रूरी लगा. तुम्हारी खुदकुशी चटखारे लगाकर परोसी गई. नफ़रत में इस क़दर अंधे हुए लोग की तुम अपने जाने पर अफ़सोस न करते. यहां होते और ये सब तमाशा देखते तो कहते कि अच्छा हुआ जो मैने सितारों का जहां चुना. जब तुम तन्हां थे उदास थे तब किसी ने ये जानने की कोशिश नहीं कि आख़िर ये चमकता हुआ सितारा अंधेरे की तरफ़ क्यों जा रहा है, क्यों उसे उदासियां रास आने लगीं हैं, क्यों वो बंद कमरे में अपनी दुनिया समेटे हुए है. लेकिन जैसे ही तुमने इस दुनिया को अलविदा कहा तुम पर हर किसी को दया आने लगी,हर किसी की ज़ुबान पर एक ही नाम था एसएसआर.

तुम्हें गए हुए आज ठीक एक साल हो गया है. 14 जून 2020 को ये मनहूस ख़बर आई थी कि तुमने अपनी जा ले ली है. तब हर कोई सन्न रहा गया था. किसी को एतबार नहीं हो रहा था कि अचानक से ये सब कैसे हो गया. सब यही कह रहे थे कि जिसकी आख़िरी फिल्म आत्महत्या के ख़िलाफ़ हो वो खुद कैसे अपने जान दे सकता है. लेकिन इतना सबके बीच लोग ये भूल गए कि तुम एक इंसान थे फरिश्ता नहीं. तुम भी गलतियां कर सकते थे तुम भी परेशान हो सकते थे तुम्हें भी उदासी काट रही होगी, तुम भी डिप्रेशन में खुद को खो रहे होगे. सवाल यही है कि जो शख़्स सबके साथ मुस्कुराता है जो चमक धमक में रहता है क्या वो अंधेरों में नहीं जा सकता है. तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे नाम पर तुम्हारी आत्महत्या पर जो गंदगी फ़ैली वो तुम्हें बेहद तकलीफ़ पहुंचाती. ऐसे बहुत ही कम लोग होंगे जिन्हें तुम्हारे जाने से बहुत फर्क पड़ा हो लेकिन तुम्हें इंसाफ़ दिलाने के नाम पर जो नफ़रत फैलाई गई वो हैरान करने वाली थी. मीडिया ने टीआरपी के लिए तुम्हें प्राइम टाइम का मुद्दा बना लिया. तुम्हें जमकर भुनाया. तुम्हारे रिश्तों का मज़ाक बनाया, तुम्हारी मोहब्ब्त को सरेआम रुसवा किया गया.

सुशांत हम तुम्हारी तकलीफ तुम्हारी तनहाई नहीं समझ सकते हैं, ना पहले समझे हैं ना आगे कभी समझ पाए. जब तुम्हारी मौत की ख़बर आई तो सब डिप्रेशन पर बहस करने लगे, हर कोई डिप्रेशन का एक्सपर्ट बन गया. जिसे देखो वो डिप्रेस लोगों की मदद करने की बात करने लगा. लेकिन ये संवेदनशीलता बहुत दिन तक चलती नहीं है. देखो आज सब अपनी अपनी ज़िंदगी में मशगूल हैं. और फिर कहीं कोई सुशांत किसी अंधेरी गलियों में भटक रहा होगा. कहीं किसी सुशांत के इस दुनिया से अलविदा कह देने के बाद हमें फिर याद आएगा कि अरे हम इतने असंवेदनशील कैसे हो गए. दो चार दिन तक बातें होगी, मदद के लिए लोग खड़े नज़र आएगे लेकिन फिर दुनिया अपनी रफ़्तार से चलने लगेगी. सुशांत मुझे अफ़सोस है कि तुमने ज़िंदगी से मुंह मोड़ने का फ़ैसला किया. पता नहीं वो कौन से हालात थे कि तुम इतने कमज़ोर पड़ गए. तुम चाहते तो लड़ सकते थे अपनी नियति को बदल सकते थे. तुम जूझते और जीतते भी और फिर सुनाते अपनी कहानी कि कैसे तुमने अँधेरों को मात दी है.
रातों को जागकर सितारों के आगे के जहां की सैर करने वाला ना जाने क्या क्या चाहता था. तुम भी तो गैलेक्सी में खुद को तलाश रहे थे. तुम्हें सबकुछ चाहिए थे. लेकिन हर किसी को हर कुछ कहां मिलता है. तुमने अपने रास्ते खुद चुने, अपनी मजिल भी. टीवी की दुनिया से निकल कर आया एक शर्मिला लड़का जो इंजीनियरिंग कर रहा होता है वो एक्टिंग चुनता है और एक दिन बॉलीवुड का चमकता सितारा बनता है. ये सब तुमने ही तो चुना था और मौत भी तुमने खुद चुन थी. तुम बेचैन रूह थे जिसे सुकून की तलाश थी और वो सुकून की तलाश तुम्हें भटका गई . प्रिय सुशांत तुम मेरे पसंदीदा कलाकारों में से एक थे तुम्हारी मासूमियत तुम्हारी कलाकार रोक लेती थी. अब कुछ नहीं सिवाए यादों के. तुम्हारी फिल्म्स तुम्हारी कला की गवाह हैं. तुमने अपना मुकाम खुद बनाया था तुम किसी के रहमोकरम पर नहीं थे.

सुशांत तुम्हें गए हुए भले एक साल हो गए लेकिन तुम हमारे साथ हो, तुम अपनी बहनों के साथ हो अपने पिता के और अपने लाखों करोड़ों फ़ैन्स के साथ हो. तुम ख़ुश रहो उस दुनिया में जिसे तुमने था. मैं दुआ करती हूं कि वहाँ तुम वो हर कुछ हासिल करो जो इस दुनिया में नामिला. यहां नफ़रतें बहुत हैं, मतलबी दुनिया है ये .इसने अपने फायदे के लिए तुम्हारी मौत का भी तमाशा बना दिया और दूर खड़ी तालियां बजाती रही. हम दआ करेंगे की अब किसी सुशांत को अंधेरों से हारना ना पड़े, ज़रूरत है मज़बूती से हाथ पकड़ने की. हम कोशिश करें कि वो हाथ बन पाए.आखिर इतना ही कि तुमने जल्दी कर दी जाने में लेकिन “ये दुनिया अगर मिल जाती तो क्या था”

तुम्हारी शुभचिंतक
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)


ब्लॉगर के बारे में

निदा रहमान

निदा रहमानपत्रकार, लेखक

एक दशक तक राष्ट्रीय टीवी चैनल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी. सामाजिक ,राजनीतिक विषयों पर निरंतर संवाद. स्तंभकार और स्वतंत्र लेखक.

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First published: June 14, 2021, 2:28 PM IST





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