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July 31, 2021

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सुधांशु गुप्त की कहानी ‘मार्च में जून जैसी बात’

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कथाकार और पत्रकार सुधांशु गुप्त (Sudhanshu Gupta) की कहानियां हमारे सामने एक ऐसी दुनिया लाती हैं, जो सामने होते हुए भी हम अनदेखा कर जाते हैं. अक्सर ऐसा देखा गया है कि उनकी कहानी में पाठक किरदार के रूप मे खुद का खड़ा पाता है. जिस हकीकत से हम मुंह चुराते हैं सुधांशु उसे बड़ी खूबसूरती से शब्द देते हैं. ‘मार्च में जून जैसी बात’ कहानी में प्रेम, बवफाई और समर्पण को इस तरह पेश किया है कि पाठक सोचने पर मजबूर हो जाता है कि साथी की समझदारी और समर्पण को उसकी सादगी से नहीं तौला जा सकता है.

पढ़ते हैं कुछ ऐसे ही ताने-बाने पर लिखी कहानी ‘मार्च में जून जैसी बात

– सुधांशु गुप्त

मार्च का महीना है. मौसम में अभी रूमानियत बची है. वह सोकर उठा है. लेकिन उसने अभी बिस्तरा नहीं छोड़ा है. नींद खुलने के बाद कुछ देर बिस्तरे पर लेटे रहना उसे हमेशा अच्छा लगता रहा है. इस वक्त उसे सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा है. सुबह के दस बज चुके हैं. अखबार की नौकरी रात देर तक चलती है. देर से घर आओ. देर से सो जाओ और देर से उठो. उसने पाया कि वह आज अन्य दिनों के मुकाबले ज्यादा खुश है.

आज उसकी छुट्टी है. अखबार में रविवार को भाग्यशाली लोगों को ही छुट्टी मिलती है. आज सोमवार है. उसकी वीकली ऑफ है. लेकिन वह इसलिए खुश नहीं है कि आज उसका ऑफ है. उसकी खुशी का कारण कुछ और है. उसे आज एक लड़की से मिलना है. यही उसकी खुशी की वजह है. उसने फुर्ती से उठकर वॉश बेसिन पर मुंह धोया और वापस आकर अपने बिस्तरे पर लेट गया.

किचन से आने वाली आवाजें बता रही हैं कि पत्नी चाय बना रही है. उसने देखा सामने की दीवार पर घड़ी लटकी समय बता रही है. अभी उसके पास काफी समय है. उसने दीवार की तरफ पीठ कर ली है. अब उसके सामने खिड़की है. खिड़की जो हमेशा बंद रहती है. खिड़की के दोनों सिरों पर कुछ किताबें बेतरतीब रखी हैं. लकड़ी के फट्टों वाली खिड़की के दोनों किवाड़ों में जाली लगी है. बाहर एक और दरवाजा है जो बंद रहता है. उसके दोनों पल्लों पर शीशे लगे हुए हैं. खिड़की खुलने की कोई संभावना नहीं है. फिर भी उसे बाहर की दुनिया सुंदर लग रही है. रूमानी लग रही है। पता नहीं क्यों?

‘चाय’, पत्नी ने चाय का कप उसके बेड पर रखते हुए कहा है. उसने पलट कर पहले चाय और फिर पत्नी को देखा. दोनों की नजरें पल भर के लिए मिलीं. पता नहीं पत्नी उसके चेहरे पर क्या तलाशती रही.

‘खिड़की के बाहर क्या देख रहे हो?’

उसने खिड़की के बाहर देखते हुए ही कहा, ‘सोच रहा हूं कि ये खिड़की कैसे खुल सकती है?’

‘ये खिड़की नहीं खुल सकती, सालों से बंद है. अब तो जाम हो गई है,’ पत्नी ने आत्मविश्वास से कहा.

वह फिर खिड़की के बाहर की रूमानी सी लगती दुनिया को देखने लगा.

‘आज कहीं जाना है क्या?’ पत्नी ने पूछा.

‘हां, जाना है किसी से मिलने’.

पत्नी ने नहीं पूछा कि किस से मिलने जाना है. वह भीतर किचन में चली गई. उसे इस बात से बड़ी राहत मिली. पत्नी सीधी हो तो उसके बहुत फायदे हैं. वह ज्यादा सवाल-जवाब नहीं करती. पति पर आंख बंद करके भरोसा करती है. उसे कुछ भी कह कर बहकाया जा सकता है-चीट किया जा सकता है. उसे पत्नी के रूप में अपनी पसंद पर पहली बार खुशी हुई. वह खिड़की के बाहर की दुनिया को छोड़कर भीतर आया. उसने घड़ी को देखा. अभी ग्यारह बजने में थोड़ा समय है. अगर वह ग्यारह बजे तैयार होना शुरू करेगा तब भी साढ़े ग्यारह तक तैयार हो जाएगा.

मंडी हाउस पहुंचने में मुश्किल से आधा घंटा लगेगा. उससे मिलने का समय बारह बजे का है. आज पहली बार उससे मुलाकात होगी. क्या पता प्रेम की कोई नई खिड़की खुल ही जाए. उसे वह कुछ समय से जानता है. सुंदर है, समझदार है.

‘नाश्ता में क्या खाओगे?’ पता नहीं पत्नी कब अंदर से आकर उसके पास खड़ी हो गई. पत्नी के लिए समझदारी का एक ही अर्थ है पति को सही समय पर नाश्ता, लंच और डिनर उपलब्ध कराना.

‘कुछ भी बना लेना,’ इस समय नाश्ते के बारे में सोचना उसे खराब सा लगा. पत्नी फिर से अंदर चली गई और वह उठकर जाने की तैयारी करने लगा.

वह ठीक पंद्रह मिनट बाद तैयार होकर शीशे के सामने खड़ा था. ब्लैक कलर की पेंट और ब्ल्यू कलर की शर्ट. शीशे में उसने खुद को देखा. पहली बार उसे लगा कि वह स्मार्ट है. एक बार उसने कहा भी था, ब्लैक और ब्ल्यू का कांबिनेशन अच्छा लगता है. वह अच्छा लग रहा है. सब कुछ योजना के मुताबिक ही चल रहा था.

आज पहली बार उसने बाहर किसी जगह मिलने के लिए स्वीकृति दी थी. उसने कंघी से बाल सैट किए. वह पीछे की तरफ बाल बहाता है. बायीं तरफ को बाल थोड़े कम हैं और दायीं तरफ ज्यादा. फिर वह दायीं तरफ के बालों को कुछ इस तरह सैट करता है कि बाल ऊपर को उठ जाते हैं. बिल्कुल फिल्मी नायकों के बालों की तरह. बाकी सब तो ठीक था लेकिन दायीं तरफ के बाल ऊपर उठने को तैयार नहीं हो रहे थे. उसने कंघी को उल्टा करके बालों पर इस तरह फेरा की बाल सैट हो जाएं और दायीं तरफ का बालों का हिस्सा ऊपर को उठ जाए. लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी ऐसा हो नहीं रहा था. उसे अहसास हुआ कि शीशे के सामने उसे काफी समय हो गया है.

बहुत ज्यादा पुरानी बात नहीं है. वह 18-19 साल का रहा होगा. तब उनके घर में ड्रेसिंग टेबल नहीं था. उसे हाथ में छोटा सा शीशा लेकर बाल बनाने होते थे. एक बार वह इसी तरह बाल बना रहा था. पता नहीं उसे देर हुई थी या नहीं लेकिन पिता ने दूसरे कमरे से आवाज लगाकर पूछा था, क्या बात है आज किसी खास जगह जाना है. वह समझ गया था कि पिता समझ गए हैं कि उसे कहां जाना है. पिता की नजरें बहुत पैनी थीं. पिता को जवाब देने का अर्थ होता, उनके जाल में फंस जाना. वह चुप रहा और पिता के चेहरे पर मुस्कराहट खेलने लगी. लेकिन अब पिता नहीं रहे.

अब कोई नहीं है जो उसकी चालाकी या धूर्तता को पकड़ सके. घर में पत्नी और वह अकेले है. उसने दायीं तरफ गर्दन को मोड़ कर देखा है. पत्नी जमीन पर अखबार बिछा कर भिंडी काट रही है. अपने आप में डूबी हुई. उसने बालों पर आखिरी बार कंघी फेरी, शीशे में एक बार फिर से खुद को देखा और सब कुछ ठीक पाने पर कमरे से बाहर आ गया.

उसके बेड पर ही चाय और एक सैंडविच रखा था. वह चुपचाप खाने लगा. उसने पत्नी को ध्यान से देखा. पत्नी एक-एक भिंडी को पहले पानी में से निकालती है, फिर कपड़े से साफ करती है और उसके बाद एक अलग बर्तन में काटती है.

‘किससे मिलने जाना है आज छुट्टी के दिन?’ पत्नी का पूरा ध्यान अब भी भिंडी काटने पर ही था.

उसे आश्चर्य हुआ. पत्नियां एकसाथ दो या तीन जगह कैसे ध्यान लगा पाती हैं. इसके मतलब हुआ कि वह उसे देर तक शीशे में बाल बनाते हुए देख रही होगी या कम से उसके जल्दी बाहर न आने से उसने अंदाजा लगा लिया होगा कि आज तैयार होने में ज्यादा समय खर्च हो रहा है.

‘कहां खोए हो…मैं पूछ रही हूं किससे मिलने जाना है?’ पत्नी ने दोबारा पूछा. इसबार वह उसकी ही तरफ देख रही थी.

पता नहीं सवाल की गर्मी थी या जिससे वह मिलने जा रहा है उसके प्रति प्रेम भावना, उसका चेहरा लाल हो गया. फिर भी उसने खुद को संभालते हुए कहा, किसी लड़की से मिलना है.

‘उतना तो मैं भी समझ गई हूं कि किसी लड़की से ही मिलने जा रहे हो लेकिन किस लिए?’ पत्नी मानो इस मुलाकात की हकीकत जानने पर अड़ी हुई थी.

वह सोचने लगा कि किसलिए…मिलने जा रहा है वह उससे…कौन है वह उसकी और क्या होने की संभावना है. उसने एक बार फिर से पत्नी की तरफ देखा. पत्नी के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था. ऐसा लग रहा था कि उसके लिए भिंडी काटना दुनिया का सबसे अहम काम है. उसके मन में आया कि पत्नी यूं ही पूछ रही होगी, उसके मन में कुछ नहीं होगा. आखिर पत्नियों के सीधा होने का कुछ तो फायदा मिलना ही चाहिए. पता नहीं उसके मन में क्या आया, उसने कहा, सोच रहा हूं कि एक बार फिर से प्रेम कर लिया जाए…तुम्हारी तो प्रेम में कोई रुचि है नहीं.

पत्नी कुछ देर चुप रही. ऐसा नहीं था कि वह इसका जवाब सोच रही थी. भिंडियों में से एक खराब निकल गई थी और शायद वह इसी से परेशान थी. बात को बढ़ाने के लिए उसने फिर से कहा, ‘तुम ने तो न शादी से पहले प्रेम किया, न शादी होने पर… और अब शादी के बाद किसी और से तो प्रेम करने का सवाल ही पैदा नहीं होता…’

पत्नी ने पहली बार भिंडियों से ध्यान हटाकर उसकी तरफ देखा. बिना किसी उत्तेजना के, बिना किसी शिकायत के. उसने एकदम सादगी से कहा, ऐसी किसी गलतफहमी में मत रहना…..

वह फिर पहले की तरह की भिंडियां काटने में लग गई. शायद भिंडियां पूरी कट चुकी थीं. पत्नी उठी और किचन में चली गई. वह कमरे में अकेला रह गया. पता नहीं क्यों अचानक उसका सारा उत्साह छूमंतर हो गया था. उसने खिड़की के बाहर देखा. बाहर भी उसे किसी तरह की रूमानियत दिखाई नहीं पड़ रही थी. घड़ी में 11 बजकर 45 मिनट हो चुके थे. पंद्रह मिनट में उस लड़की के पास पहुंचना संभव नहीं थी. पत्नी का यह वाक्य उसके जेहन में बज रहा, ऐसी किसी गलतफहमी में मत रहना. उसे पता नहीं क्यों यह बात ऐसी लग रही थी मानो मई का रूमानी मौसम में किसी ने जून की तपती धूप जैसी बात कर दी हो. उसका बाहर जाने का मन नहीं हुआ. उसने कपड़े बदले और आकर अपने पलंग पर लेट गया. पत्नी ने भी नहीं पूछा कि जा क्यों नहीं रहे?

सुधांशु गुप्त (Sudhanshu Gupta)

तीन दशकों तक पत्रकारिता करने के बाद सुधांशु गुप्त अब पूरी तरह से साहित्य में रम गए हैं. आपके तीन कहानी संग्रह ‘खाली कॉफी हाउस’, ‘उसके साथ चाय का आख़िरी कप’ और ‘स्माइल प्लीज़’ प्रकाशित हो चुके हैं. आपकी कहानियां, सामाजिक ताने-बाने पर लेख और समीक्षाएं सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान, नया ज्ञानोदय, नवनीत, कादम्बिनी, दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, जनसत्ता, हरिभूमि, जनसंदेश, जनवाणी आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं और होती रहती हैं. रेडियो पर आपकी कई कहानियों का प्रसारण हो चुका है.



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