August 6, 2021

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Book Review : जनसरोकार की पत्रकारिता बनाम पत्रकारिता का कारोबार

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अनुराग अन्वेषी

पत्रकारिता के बदलते स्वरूप को रेखांकित करते हुए कवि-पत्रकार प्रियदर्शन ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा था कि मीडिया कभी कमजोरों की आवाज हुआ करता था, अब वह मजबूतों का बयान हो गया है. ‘कमजोरों की आवाज’ तब के दौर की बात है, जब मीडिया का मतलब सिर्फ अखबार हुआ करता था. तब वह सही मायने में चौथे स्तंभ की भूमिका निभाता था. अब की पत्रकारिता में आपको सरकारी प्रवक्ता वाला रूप ज्यादा दिख जाएगा. ऐसे ही समय में आई है जनसरोकार की पत्रकारिता को याद दिलाती मनोज कुमार मिश्र की किताब ‘अपनों का संघर्ष’. यह मनोज जी की दूसरी किताब है. इससे पहले उनकी किताब ‘मैंने दंगा देखा’ 2007 में आई थी.

मनोज जी स्वभावतः रिपोर्टर रहे हैं. इस संग्रह में शामिल कई रिपोर्ट मेरठ के वक्त के हैं और कुछ जो उन्होंने दिल्ली में रहते हुए लिखीं. सवाल उठता है कि इन पुराने रिपोर्ट को दोबारा पढ़ने के मायने क्या हैं? दरअसल, इस किताब में मनोज मिश्र अपनी 20 रिपोर्टों को याद कर रहे हैं. ये रिपोर्टिंग कैसे की गई, उन पर लोगों की प्रतिक्रिया क्या रही, तबके संपादक का रुख इन खबरों को लेकर क्या रहा – जैसे अपने तमाम अनुभव मनोज जी इस संग्रह में लेकर आए हैं. दरअसल, मनोज मिश्र ने इन रिपोर्टों के बहाने उस दौर की पत्रकारिता की याद दिलाई है जब खबरों के चयन का आधार ‘जनसरोकार से जुड़ाव’ होता था. इन्हें संकलन में शामिल करने से पहले मनोज जी ने अपनी इन रिपोर्टों को ऐसा रूप देने की कोशिश की है, जिससे यह महज बासी रिपोर्ट न रह जाएं, बल्कि इनमें इतनी ताजगी रहे कि आप इनकी तुलना अब की पत्रकारिता से कर सकें.

मनोज मिश्र ने अपनी तब की रिपोर्टिंग को आज के संदर्भों से जोड़कर देखने की कोशिश की है. यह किताब किसी नए रिपोर्टर के लिए भी महत्वपूर्ण है और डेस्क पर काम करने वालों के लिए भी. यहां यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि यह किताब मूलतः प्रिंट मीडिया के रुझान और रुख बताती है. गर आप चाहें तो इसमें वेब जर्नलिज्म या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की रिपोर्टिंग के लिए भी सीखने की सामग्री तलाश सकते हैं.

संग्रह की पहली टिप्पणी में मनोज जी याद करते हैं मेरठ की अंशु को, जिस पर सोते वक्त तेजाब से हमला हुआ था. वह बताते हैं कि 15 जुलाई 1995 को जब वह मेरठ में जनसत्ता के दफ्तर में बैठे थे, तभी उनसे मिलने आए महेश कुमार सक्सेना. सक्सेना से यह उनकी पहली मुलाकात थी. सक्सेना अंशु के पिता हैं और बेटी के साथ हुए तेजाब हमले से पहले वे शिक्षक हुआ करते थे. 24 अगस्त 1987 की रात उनकी सोती बेटी के चेहरे पर अपराधियों ने तेजाब की पूरी बोतल खाली कर दी थी. इसके बाद महेश कुमार सक्सेना अपनी बेटी के इलाज के लिए अस्पताल और डॉक्टरों के चक्कर लगा रहे थे. जनसत्ता के दफ्तर में वे मदद की उम्मीद लेकर आए थे.

आज की पत्रकारिता में ऐसी किसी घटना की कल्पना करूं कि कोई शख्स मदद की उम्मीद के साथ किसी अखबार के दफ्तर में पहुंचा है तो रिपोर्टरों-संपादकों के जेहन में कौन सी बातें आएंगी. पहली बात तो रिपोर्टर यही सोचेगा कि 87 में हुई ‘घटना’ को वर्ष 95 में छापने का औचित्य क्या है? गर उसने संपादक से पूछ लिया कि 87 में हुए तेजाब हमले में मदद की उम्मीद के साथ एक शख्स आया था, क्या इसे बनाऊं? तो मुमकिन है कि संपादक पूछ बैठे कि इस ‘घटना’ में नया डेवलपमेंट क्या है? तुम्हारा निजी इंटरेस्ट क्या है? आपको बता दूं कि प्रिंट पत्रकारिता में अब संवेदनशीलता इतनी नहीं बची कि ‘वारदात’ और ‘घटना’ का फर्क पत्रकार महसूस करें. अब बड़ी से बड़ी वारदात उनके लिए महज घटना है. दूसरी सचाई न्यूज रूम की यह भी है कि जब तक कोई बुरी खबर उनके हाथ नहीं लग जाती, उनके चेहरे लटके होते हैं कि आज के पहले पन्ने की लीड क्या हो. यानी, देश, दुनिया और समाज के लिए जो सबसे बुरी खबर है, वही आज की पत्रकारिता के लिए सबसे अच्छी खबर है.

लेकिन, 95 में जनसत्ता ने क्या किया? मनोज कुमार मिश्रा ने विस्तार से खबर लिखी और लोगों से मदद की अपील की. जनसत्ता ने यह खबर बहुत प्रमुखता से छापी. इसका नतीजा यह रहा कि कई जगहों से मदद करने के लिए लोग सामने आए. इतना ही नहीं, खबर पढ़ने के बाद ग्वालियर, महाराजपुर के उपस्कर अनुभाग, वायुसेना में तैनात जयदीप ‘द्विरेफ’ ने जनसत्ता के तत्कालीन संपादक प्रभाष जोशी से संपर्क किया और अंशु से शादी के प्रस्ताव का पत्र भेजा. जिसमें उसने वायुसैनिक के पत्नी के रूप में अंशु का उपचार कराने की पेशकश की. उसके बाद मनोज जी ने अंशु के पिता से संपर्क किया और अंततः उसकी शादी जयदीप से संपन्न हुई.

यह तो ‘अपनों का संघर्ष’ में शामिल पहली रिपोर्ट है. ऐसी रिपोर्टों की भरमार है इस संकलन में. मनोज जी शिद्दत से याद करते हैं 12 साल की उस अंशु को जो अपने ही परिजनों की दरिंदगी की शिकार हुई थी (हां, अब की पत्रकारिता में अक्सर लोग इस बात का ध्यान रखते हैं कि नाबालिग – अपराधी हो या पीड़ित – की पहचान गुप्त रखी जाए). मुजफ्फरनगर के खंदरावली की वारदात की भी चर्चा लेखक ने की है. यह वारदात 1993 में गुर्जरों के प्रभाव वाले गांव खंदरावली में हुई थी. यहां भरी पंचायत में प्रेमी जोड़े को काट डाला गया था. पुलिस इस मामले को दबा देना चाहती थी. पर उस समय के अखबार लगातार इस वारदात की रिपोर्टिंग करते रहे. आखिरकार, पुलिस ने मामला दर्ज कर इस हत्या में शामिल लोगों को गिरफ्तार किया और अंततः अदालत से उन्हें सजा मिली.

इस किताब में कई ऐसी रिपोर्ट भी हैं जो मेरठ शहर का औद्योगिक चेहरा सामने रखती हैं. इन रिपोर्टों में मेरठ के कैंची व्यवसाय, बुनकरों के हालात, खेल-कूद के सामान बनाने वालों के उद्योग और लुगदी साहित्य प्रकाशन की बुरी हालत की वजहों की पड़ताल की गई है. जाहिर है, मेरठ का चेहरा अब वही नहीं है, जो 70 से 90 के बीच रहा था. तब जिन व्यवसायों के लिए मेरठ जाना जाता था, वे व्यवसाय अब भी वहां हैं, पर उनकी हालत खस्ता हो चुकी है. अब की पत्रकारिता के पास जनसरोकार के लिए बहुत ज्यादा स्पेस नहीं रह गया है. सबके अपने टारगेट रीडर हैं, सबके अपने निजी हित हैं. इन रिपोर्टों को देख कर लगता है कि अगर ये आज लिखी जाएं तो शायद मैनेजरनुमा संपादकों को रास नहीं आएंगी.

इस किताब से गुजरते हुए जो बात सबसे ज्यादा खटकी वह है इसकी भाषा संबंधी अशुद्धियां. लगता है कि प्रकाशन से पहले न तो लेखक ने प्रूफ देखने की जरूरत समझी और न ही प्रकाशक ने. नतीजा है कि कई जगहों पर मीडिया, समाज जैसे शब्द स्त्रीलिंग रूप में छप गए हैं. ऐसी कमियों को अगर नजरअंदाज कर दें तो यकीनन पत्रकारिता और रिपोर्टिंग को लेकर यह किताब राह सुझाती है. इसमें जनसरोकार की खबरें लिखने के वक्त बरती जाने वाली सावधानियों के प्रति भी अप्रत्यक्ष रूप से सजग किया गया है. मनोज जी के शब्दों में ‘इस किताब को भविष्य के पत्रकार, खास करके रिपोर्टरों को भी ध्यान में रखकर तैयार किया. यह जताने का प्रयास किया कि एक रिपोर्टर से समाज कुछ अलग तरह की भी अपेक्षा रखता है…’. मनोज जी की इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि समाज एक रिपोर्टर और उसके अखबार से कुछ अलग तरह की अपेक्षा रखता है. मगर दुख के साथ यह स्वीकारना पड़ता है कि 91 में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद मीडिया के बड़े हिस्से में बड़ी पूंजी का खेल शुरू हुआ. उदारीकरण से भारत में अचानक पूंजी की बाढ़ आई. इस बाढ़ ने मीडिया पर नए अर्थशास्त्र की गाद बिछा दी. अखबारों को यह नया अर्थशास्त्र समझ भी आया और रास भी. और तब अखबार पाठकों के लिए नहीं, विज्ञापनदाताओं के लिए निकलने लगे. कहा जा सकता है कि उदारीकरण ने पत्रकारिता का चेहरा बहुत बदला है, जाहिर है इस अर्थ में पत्रकारों का वर्ग चरित्र भी बदला है. जो पत्रकारिता कभी तलवार की धार पर चलने का नाम हुआ करती थी, वह अब तनी हुई रस्सी पर किसी नट की तरह संतुलन साधने के कौशल का नाम होती गई है.

पुस्तक : अपनों का संघर्ष

लेखिका : मनोज मिश्र

प्रकाशक : शशि प्रकाशन

कीमत : 130 रुपये



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