September 22, 2021

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‘Navarasa’ Film Review: ‘नवरस’ के कुछ रस तो बहुत ही बेस्वाद हैं

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कोविड 19 की महामारी ने इस बार सभी पीड़ितों को एक बात सिखा दी कि मदद के लिए दिल से आवाज निकलती है, तो किसी दिल तक पहुंच ही जाती है. दूसरी बार जब कोरोना का प्रकोप हुआ तो अनगिनत जानों का नुकसान हुआ, लेकिन पहली बार के झटके से त्रस्त लोग इस बार थोड़ा तैयार थे. दक्षिण भारत में शूटिंग के ना हो पाने की वजह से कई लोगों के रोजगार के लाले पड़ गए थे. इस बात का संज्ञान लिया प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक मणि रत्नम और उनके मित्र क्यूब सिनेमा के जयेन्द्र पंचपाकेसन ने. उन्होंने तय किया था कि वो कि पैसा जुटाने के लिए फिल्म बनाएंगे और इस तरह “नवरस” नाम की एन्थोलॉजी का विचार आया. मणि रत्नम की कंपनी मद्रास फिल्म्स ने इस एन्थोलॉजी के जरिये ओटीटी की दुनिया में कदम रखा है. 9 कहानियों में से कुछ अच्छी बनी हैं और कुछ साधारण हैं. मणि रत्नम की कंपनी का डिजिटल पदार्पण पूरी तरह से स्वाद नहीं परोस सका.

अभिनय के 9 रस होते हैं. हर रस पर एक फिल्म बनाई जाए तो एक एन्थोलॉजी की थीम बन सकती है और देखने वालों को भी एक कड़ी पकड़ के चलने मिलेगी, हालांकि इस एंथोलॉजी की परिभाषित करना दुरूह कार्य है. किसी भी कहानी में कोई तार ऐसा नहीं है, जो जुड़ा हुआ हो. सब अपने आप में एक फिल्म हैं. कोई कॉमन बात है, तो वो किसी को नज़र नहीं आती. कुछ कहानियां शायद लेखक और निर्देशक के मन में ही रह गई हैं, दर्शकों को समझ नहीं आई हैं. अति-विद्वान निर्देशकों की ये समस्या होती है. खुद कहानी को लेकर उत्साहित हो जाते हैं और ये नहीं सोचते कि फिल्म दर्शकों के देखने के लिए है, सिर्फ निर्देशक की आत्मरति के लिए नहीं है. नवरस की सबसे बड़ी खामी है कि निर्देशकों ने मणि रत्नम को इम्प्रेस करने के उद्देश्य से फिल्में बना दी और दर्शकों को बिलकुल भूल गए हैं. जमनालाल बजाज इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज, मुंबई से एमबीए किये हुए मणि ये कैसे भूल गए कि फिल्में दर्शकों के मनोरंजन के लिए बनायी जाती हैं.

पहली कहानी के निर्देशक हैं बिजॉय नाम्बियार. उनकी पहली फिल्म शैतान और बाद में फरहान अख्तर अमिताभ बच्चन अभिनीत वज़ीर की वजह से उनका काफी नाम हुआ. “करुणा” रस पर आधारित इनकी फिल्म है “दुश्मन” जिसमें प्रतिभाशाली विजय सेतुपति और अनुभवी रेवती प्रमुख भूमिकाओं में है. रेवती एक ऐसी पत्नी की भूमिका में हैं जिन्होंने अपने पति प्रकाश राज से पिछले कई सालों से बात तक नहीं की. प्रकाश राज एक बैंक मैनेजर हैं जो विजय सेतुपति के भाई का लोन पास करने में आनाकानी करते रहते हैं और इस वजह से वो आत्म हत्या कर लेता है. गुस्साए विजय सेतुपति, अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए प्रकाश राज के घर जाते हैं और उन्हें मार देते हैं. बात यहां तक भी ठीक थी, लेकिन क्लाइमेक्स इतना मूर्खतापूर्ण था कि लगा ही नहीं कि कहानी का मूल आयडिया मणि रत्नम का है. मंदिर में विजय अपनी गलती की माफ़ी मांगने रेवती को ढूंढता हुआ पहुंचता है और रेवती पूरी घटना का दोष ओढ़ लेती है. कहानी ख़त्म. इसमें करुणा कहां से आयी? करुणा किस तरीके से दिखी? कौनसा अभिनय ऐसा था जिसको देख कर करुणा उत्पन्न हो जाती. सीधी सीधी बदले की कहानी है. विजय, रेवती और पति की भूमिका में प्रकाश राज नहीं होते तो फिल्म बनाने वाले के लिए मन में करुणा नहीं जुगुप्सा जाग जाती.

दूसरी कहानी है हास्य रस पर आधारित प्रियदर्शन की फिल्म “समर ऑफ़ 92” जिसमें प्रसिद्ध हास्य अभिनेता योगी बाबू प्रमुख भूमिका में हैं. स्कूल के 100 साल पूरे होने पर एलम्नाय यानि पूर्व छात्र के तौर पर योगी बाबू का आना होता है जो अब फिल्मों के जाने माने कॉमेडियन बन चुके हैं. प्रथा के अनुसार वो भाषण देते हैं और पुराने दिनों को याद करते हैं. इसमें क्या कॉमेडी है? स्कूल के उस वक़्त के प्रिंसिपल नेदुमदी वेणु अपनी बिटिया राम्या के लिए रिश्ता ढूंढ रहे हैं. उनकी बेटी एक क्रिस्चियन पादरी का कुत्ता घर ला कर पाल रही होती है इसलिए योगी बाबू को कहा जाता है कि वो कुत्ते को घर से दूर रखें ताकि रिश्ते की बात हो सके. कुत्ता योगी बाबू की गिरफ्त से भाग जाता है, गटर में गिर जाता है और घर पर आ कर सब मेहमानों के सामने अपने आप को झाड़ के सारा मैला उन पर गिरा देता है और शादी की बात ख़त्म हो जाती है. इस कहानी का मूल भाव हास्य है. किस तरीके से इसमें हास्य डाला गया है वो विचारणीय है. भारी भरकम शरीर वाले योगी बाबू के किशोरावस्था का किरदार निभाने वाले कलाकार को सूअर, मोटा और न जाने किस किस नाम से बुलाया जाता है. इसमें हास्य कहां हैं? प्रियदर्शन की हंगामा 2 के बाद ये अगली प्रस्तुति है, और लग रहा है कि अब उनमें जादू बचा नहीं है.

तीसरी कहानी प्रोजेक्ट अग्नि का आधार अद्भुत रस है और इसके निर्देशक हैं कार्तिक नरेन जो तमिल सिनेमा के उभरते निर्देशक माने जा रहे हैं और वो जल्द ही धनुष को लेकर एक फिल्म निर्देशित कर रहे हैं. ये फिल्म अच्छी बनी है. विज्ञान की कहानी है और अरविन्द स्वामी ने इस कहानी को अकेले ही अपने दम पर खींचा है. मायन और सुमेरन सभ्यता से बात की शुरुआत होती है. टाइम स्पेस, भूतकाल में जाने के लिए बनायीं मशीन और समय के साथ खिलवाड़ करने की इंसान की आदत के दुष्परिणामों का चित्रण है. फिल्म में पुराणों का ज़िक्र है तो अरविन्द स्वामी के किरदार का नाम विष्णु, उनकी पत्नी का नाम लक्ष्मी है और उनसे मिलने के लिए कृष्ण आते हैं. कहानी के विलन का नाम कल्कि रखा गया है जो पुराणों के अनुसार तबाही ले कर आ सकते हैं. कहानी का मिज़ाज वैज्ञानिक होने की वजह से आम जनता के समझ के बाहर है लेकिन फिल्म बड़े ही आसान तरीके से बनी है.

चौथी कहानी है निर्देशक वसंत की वीभत्स रस पर आधारित “पायसम” जिसमें अदिति बालन, रोहिणी और दिल्ली गणेश मुख्य कलाकार हैं. पूर्वाग्रहों और संकीर्ण मानसिकता से समाज को जिस तरीके से आघात पहुंचाया है उसने लोगों के मानस में एक वीभत्स भावना भर दी है – घृणा. कुत्सित विचारधारा वाले एक ताऊजी (देल्ही गणेश) अपनी विधवा बेटी को लेकर अपने भतीजे के घर उसकी बेटी की शादी में आ धमकते हैं. ताऊजी के मन में जलन, कुढ़न और गन्दी सी चिढ है इस शादी को लेकर. ताऊजी का सम्मान किया जाता है, उन्हें नया कोट पहनाया जाता है लेकिन वो फिर भी चिढ़े हुए ही रहते हैं. एक दृश्य में वो घर की और चल कर आते हैं तो रस्ते में कभी गाडी, कभी स्टूल या ऐसी ही चीज़ों से टकराते हैं. लगता है निर्देशक ने उनकी पास की कमज़ोर नज़र का सांकेतिक इस्तेमाल किया है. अदिति बालन ने विधवा का किरदार निभाया है और वो बहुत ही सुन्दर अभिनय करती हैं. समाज के अन्य लोगों की निगाहों का सामना करते हुए जब वो शादी में पहुंचती है तो उपस्थित अन्य मेहमान उसे जिस नज़र से देखते हैं और अदिति के चेहरे पर जो भाव आते हैं वो उनकी परिपक्वता है. तमिल विवाह रीतियों और शादी के लिए बजने वाले असली वाद्य यंत्रों का संगीत मन मोह लेता है. फिल्म अपना सन्देश ठीक से समझा नहीं पाती है.

एक मार्मिक कहानी देखनी हो तो पांचवे रस अर्थात शांत रस की कहानी देखी जा सकती है. मात्र 28 मिनिट लम्बी इस कहानी में तमिल फिल्मों के सुपर हिट निर्देशक कार्तिक सुब्बाराज थोड़ा असर छोड़ पाए हैं. कार्तिक ने इसके पहले पिज़्ज़ा, जिगरठण्डा और जगमे थंडीरम जैसी फ़िल्में निर्देशित की हैं. फिल्म में एक और सुपर हिट निर्देशक गौतम वासुदेव मेनन बतौर अभिनेता काम कर रहे हैं. एलटीटीई के विद्रोहियों की इस छोटी सी कहानी में गांव में मुठभेड़ के आसार बनने लगते हैं. विद्रोहियों के एक छोटे से समूह में एक शख्स (बॉबी सिम्हा) के भाई को एक युद्ध में मार दिया गया था. उसे एक छोटा लड़का मिलता है जो उसे अपने भाई को बचाने के लिए कहता है. सैनिक अपनी जान पर खेल कर जब वहां पहुंचता है तो उसे पता चलता है कि उस बच्चे का भाई एक नन्हा कुत्ता है. वो कुत्ते को बचाता है और गोलियां चलने लगती हैं. उसे भी गोली लग जाती है, उसके साथी कवर फायर करते हैं. थोड़ी देर बार गोलियां बंद हो जाती हैं और वो उस कुत्ते को सही सलामत ले आता है. फर्स्ट एड के बाद वो एक टीले पर खड़ा हो कर दुश्मन सैनिकों का धन्यवाद करता है कि उन्होंने कुत्ते की वजह से ही सही गोलियां नहीं चलायी. तभी उसे गोली लगती है और वो मर जाता है. शांति की इस कहानी में निर्देशक और लेखक विवेक हर्षन क्या कहना चाहते थे वो तो समझना मुश्किल है लेकिन फिर भी फिल्म अच्छी बनी है.

अभिनेता अरविन्द स्वामी ने भी इस एन्थोलॉजी के साथ निर्देशन की दुनिया में कदम रखा है और रौद्र रस की कहानी “रौद्रम” प्रस्तुत की है. ये कहानी सबसे प्रभावी है और देखने वालों पर एक गहरा असर छोड़ जाती है. गरीबी से त्रस्त अरुल (श्रीराम) अपनी मां और छोटी बहन के साथ रहता है. सपने बड़े हैं लेकिन छोटी जाति और घर घर जा कर सफाई करने वाली मां की कमाई से वो सपने पूरे नहीं हो सकते. अरुल के मन में असंतोष बढ़ने लगता है. एक दिन मां अपने बच्चों को बढ़िया खाना खिलने और शॉपिंग के लिए ले जाती है. अरुल नए जूते लेकर फुटबॉल खेलने जाता है और सबसे बढ़िया प्लेयर का कॅश रिवॉर्ड जीत कर अपनी मां को वो ये पैसे देने जाता है तो देखता है उसकी मां घर के मालिक के साथ हम बिस्तर है. उसे तब समझ आता है कि उसकी मां वेश्यावृत्ति करने लगी है. अरुल के मन में भरी वितृष्णा की वजह से उसके अंदर हिंसा जन्म लेती है और वो तकरीबन पेशेवर अपराधी बन जाता है. समय करवट लेता है और मां अब मृत्यु शैया पर है, अरुल अपनी बहन को फ़ोन करता है जो अब बड़ी पुलिस अफसर है और अपराधियों के साथ बहुत ज़्यादा सख्ती से पेश आती है. दोनों के रौद्र रूप फिल्म में देखने को मिलते हैं. अभिनय सभी कलाकारों ने अच्छा किया है. दुखद बात ये है कि किसी भी कलाकार के प्रति कोई संवेदना जागृत नहीं होती.

कन्फ्यूजन की कहानियों में एक और कहानी है आर रतिंद्रन प्रसाद की फिल्म इनमयी जो कि डर की कहानी है. इसमें सिद्धार्थ और पार्वती प्रमुख भूमिका में हैं. मुस्लिम परिवेश की कहानी बना कर जिन्न की बात सुनाने की कोशिश की गयी है. अजीब सी कहानी है. मूलतः बदले की कहानी है. लेकिन इसमें डरने का क्या था वो समझ नहीं आया. किसी भी दृश्य में ऐसा कुछ नहीं था जो कि देखने वाले को ऑंखें बंद करने की हद तक डरा सके. लचर कहानी को सिद्धार्थ और पार्वती भी बचा नहीं सकते थे और वही हुआ. आठवां रस यानि वीर रस है और इसकी कहानी स्वयं मणि रत्नम ने लिखी है और निर्देशित की है सर्जुन केएम ने. मणि रत्नम की कहानी ने निराश किया. आर्मी अफसर (अथर्व) एक नक्सली (किशोर) को गोली मार कर गिरफ्तार कर लेता है. आर्मी हेडक्वार्टर में ले जाते समय उस नक्सली का खून बहने की वजह से तबियत ख़राब होने लगती है. आदेशों के विपरीत, ऑफिसर उसे अस्पताल ले आता है जहां से नक्सली फरार हो जाता है. कहानी ख़त्म हो जाती है. इस फिल्म में अगर आर्मी ऑफिस की पत्नी मुथुलक्ष्मी (अंजलि) के दृश्य नहीं होते तो ये फिल्म बोझल हो गयी होती. फिल्म निहायत ही बोरिंग हैं.

आखिरी रस श्रृंगार रस है जिसकी फिल्म गौतम वासुदेव मेनन ने निर्देशित की है और इसका नाम है गिटार कम्बी मेले निन्द्रू। जितना साहित्य पढ़ा है उसके हिसाब से श्रृंगार व्यक्ति के श्रृंगार से लिया गया है. इस फिल्म में प्रेम रस है, श्रृंगार जैसा तो कुछ नज़र नहीं आया. सूर्या को एक बेहतरीन गायक का रोल मिला है और वो गिटार बजाते हुए गाने गाते हैं और जल्द ही ग्रैमी अवार्ड भी जीत लेते हैं. फ्लैशबैक में उनकी प्रेम कहानी दिखाई गयी है जिसकी वजह से उनके संगीत में फीलिंग आ पायी है. इसमें श्रृंगार क्या था? फिर से खोजिये. फिल्म के गाने अच्छे हैं और बस वही अच्छा है. अभिनय में सूर्या या प्रज्ञा मार्टिन कमज़ोर नहीं हैं लेकिन निर्देशक को सही कहानी चुनने में बहुत मेहनत करनी चाहिए थी. निर्देशन भी ठीक ठाक है. कुल जमा “नवरस’ की अधिकांश फिल्मों में रस है नहीं। ऐसा बताया और समझाया जा रहा है कि नवरस में पूरे नौ रस हैं, जबकि ऐसा कुछ नहीं है. हां “बोरियत” रस की भरमार है. उस वजह से मणि रत्नम का नाम ख़राब होगा. ये बहुत ही ख़राब एन्थोलॉजी है. इसे देखना अवॉयड कर सकते हैं.

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