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Podcast: दूरियों को पाटतीं केट समर्स, एंजेला मॉर्गन, एमिली और लिसा मार्क्स की 4 कविताएं| poems of hope and trust amidst corona in world podcast by pooja prasad bgys

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न्यूज18 हिन्दी के स्पेशल पॉडकास्ट में आज मैं आपके लिए लाई हूं आशा और उम्मीद से महकती कविताएं इस विश्वास के साथ कि ये हमें हौसला देंगी और मजबूती की मशाल जलाए रखेंगी…


पंजाबी कवि अवतार सिंह संधू पाश की एक कविता है ‘घास’. इसके शुरू में ही उन्होंने लिखा है – मैं घास हूं, आपके हर किए धरे पर उग आऊंगा… इन पंक्तियों को आज इसलिए याद कर रही हूं क्योंकि हमने देखा है कि घास की जिजीविषा एकदम अद्भुत होती है. वैसी ही जैसी कि मनुष्य की होती है, वह जो हर बुरे दौर से जूझता है, जंग लड़ता है और आखिरकार हर बुरे दौर पर भारी पड़ते हुए उससे बाहर निकल आता है. प्रेमचंद को याद करें तो ध्यान आता है कि उन्होंने लिखा था- आशा घास की भांति होती है जो ग्रीष्म के ताप से जल जाती है, भूमि पर उसका निशान तक नहीं रहता. लेकिन पावस की बूंद पड़ते ही फिर जली हुई जड़ें पनपने लगती हैं और उसी शुष्क भूमि पर हरियाली लहराने लगती है. इंसान के भीतर की आशा भी घास की तरह होती है दोस्तों, जो हर ग्रीष्म के ताप से झुलस-वुलस भले जाए, लेकिन अवसर पाते ही लहलहाने लगती है. आज का यह दौर इस ग्रीष्म की तरह ही है. मगर इंसान, चाहे वह भारत का हो, अमेरिका का हो, अफ्रीका का हो या विश्व के किसी भी हिस्से का, उसी घास की तरह होता है जो अपनी आशा के बलबूते पर लहलहाना जानता है और लहलहाकर ही दम लेता है. यही कहती हैं कवयित्री केट समर्स जिनकी कविता को अनूदित किया है पत्रकार, साहित्यकार, कवि भुवेंद्र त्यागी ने.

उम्मीद देती है हौसला
तब भी, जब हमें न सूझे राह।
चाहे कुछ भी हालात हों
उम्मीद ही दे सकती है नई सुबह।
‘यह भी गुजर जाएगा’ की कहावत
उम्मीद से भर देती सबको।
उतार-चढ़ाव आएं जीवन में बार-बार
फिर भी रखें उम्मीद, न मानें हार।
बेहतर दिनों की आशा
की प्रार्थना दूर करे हताशा।
बस आशीषों पर रखें ध्यान
बैठे-बैठे कभी न लें तनाव।
अपनी आशा कभी मत खोना
आशा और कर्म से ही मिले सोना।
आशा देती जीवन में सुख अपार
अच्छाई रहे साथ, मुश्किलें जाएंगी हार।

न्यूज18 हिन्दी के स्पेशल पॉडकास्ट मैं पूजा प्रसाद बहुत सारे नेह के साथ आपका स्वागत करती हूं. आज मैं आपके लिए लाई हूं आशा और उम्मीद से महकती कविताएं इस विश्वास के साथ कि ये हमें हौसला देंगी और मजबूती की मशाल जलाए रखेंगी. अगली कविता है एमिली डिकिंसन की, जो अमेरिकी कवयित्री हैं. एमिली के जीवनकाल में उनकी चार पांच कविताएं ही पब्लिश हुई थीं बाकी उनकी मृत्यु के बाद उनकी बहन ने पब्लिश करवाईं. एमिली एकदम एकांत प्रिय थीं. बमुश्किल ही बाहरी लोगों से मिलती जुलतीं. कहते हैं कि कुछ रचनाएं उन्हें खुद नष्ट भी कर दीं. मगर जीवन, प्रेम, प्रकृति, मृत्यु पर लिखी उनकी कविताएं जब सामने आईं तो बहुत पसंद की गईं. पेश है उनकी कविता आशा के होते हैं पंख…

आशा के होते हैं पंख
आत्मा में बसती यह बात
और बिन शब्दों के निकले धुन
कभी न रुके, कभी नहीं
आंधी में भी सुन सकें मधुर
कितना भी हो तेज तूफान-
झकझोर दे जो नन्ही चिड़िया को
फिर भी बची रहे उष्णता
सुना है इसे सबसे सर्द जगह
और सबसे अबूझ समंदर पर
फिर भी इसने कभी कुछ
पूछा नहीं मुझसे, कभी नहीं।

हिन्दी के मशहूर शायर दुष्यंत कुमार कहते हैं, दुख को बहुत सहेज के रखना पड़ा हमें, सुख तो किसी कपूर की टिकिया-सा उड़ गया. लेकिन दोस्तो, सच तो यह है कि सुख कपूर की टिकिया सा उड़ भले गया हो मगर इसकी खुशबू दिलोदिमाग में रची बसी तो रहती ही है. और यही तो हमें लड़ने-जूझने का हौसला देती है. दोस्तो, अमेरिकी कवयित्री एंजेला मॉर्गन भी अपनी कविता में बात करती हैं उस जिजीविषा की जो युद्ध के बावजूद, मृत्यु के बावजूद दीप्तवान रहती है. मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं. क्योंकि, जीवन तो अपनी राह खोज ही लेता है न… प्रस्तुत है उनकी कविता युद्ध के बावजूद..

युद्ध के बावजूद, मृत्यु के बावजूद,
मनुष्य के तमाम कष्टों के बावजूद,
मेरे भीतर कुछ हंसता और गाता है
और मेरा मन इसे खूब सराहता है।
युद्ध के बावजूद, नफरत के बावजूद
बकाइन खिल रहे हैं मेरे द्वार पर,
ट्यूलिप झर रहे हैं आगे राह पर
युद्ध के बावजूद, रोष के बावजूद।
‘साहस!’ का सुबह को महिमामंडन,
‘आनंद‘ के व्याख्यान का आलंबन,
और जब मुझे देख मुस्कराते फूल
खिल-खिल जाता मन सब कुछ भूल।
समंदर पर लगता झूमते बादलों का मेला,
चमकती लहरें मुझे बुलाने का करतीं खेला
भले हो मरीचिका, पर कोई बात नहीं,
जगह-जगह पर, हर एक जगह पर
निराशा को पीछे छोड़ ही देती आशा।
चाहे गरजें बंदूकें या फिर दहाड़ें तोपें,
खिलते हैं बगीचे, जिनमें गुलाब हों रोपें,
दमकेगी जरूर मेरी आत्मा हर हाल में
उसी मशाल पर जहां से आएं खसखस।
जहां सुबह की वेदी हो जाती शफ्फाक
चांदी के कलश उठाएं लिली अपने माथ
युद्ध के बावजूद, शरमो-हया के बावजूद।
और मेरे कान में आती है फुसफुसाहट,
‘दुःस्वप्न से जागो! देखो और विचारो
कि नश्वर है जीवन, लेकिन परमानंद है
युद्ध के बावजूद, मृत्यु के बावजूद!’

दोस्तो, इंतजार बहुत दुरुह होता है लेकिन वह सब्र का ही दूसरा नाम है. और यह सब्र कितना जरूरी होता है यह हमने अपने अपने जीवनकाल में कभी न कभी अनुभव किया ही होगा. कवयित्री और पत्रकार लिसा मार्क्स अपनी चर्चित कविता -बस, सूरज का करो इंतजार- में जो कहती हैं वह काबिलेगौर है. लिसा ने यह कविता पिछले ही साल मार्च में लिखी थी. वह कहती हैं, मेरी यह कविता बेहतर दिनों की आस में और बुरे दिनों के बीत जाने के इंतजार के बारे में है. पेश है बस, सूरज का करो इंतजार

जब घना अंधियारा हो
और बेइंतहा अकेलापन लगे आपको
जब बारिश रुकने का नाम न ले
और आप पहुंच न पाओ घर,
जब लगे, गंवा दिया है सब कुछ
और आप बस पलायन करना चाहो,
तो जान लो, कभी तो रुकेगी बारिश
बस, सूरज का करो इंतजार।
जब दर्द बन जाए परिवार,
जब आपको न मिले कोई दोस्त,
जब आप सिर्फ चीखना चाहो
लेकिन मुंह से न निकले आवाज,
जब सारी गलती हो आपकी,
और आपको लगे कि बहुत हुआ,
बस, सूरज का करो इंतजार।
धूप खिलेगी, होगी रोशनी।
तूफान तो हमेशा गुजर ही जाए।
हमेशा तो वह रहता नहीं।
बारिश थम ही जाती है, अच्छे मौसम को देती राह।
सबसे उज्ज्वल, सबसे सुखद दिन तो अभी आने हैं।
बस, सूरज का करो इंतजार।
धूप खिलेगी, होगी रोशनी।
जिन लोगों को है जरूरत आपकी,
जो अब भी करते हैं प्यार आपसे
वे जगमग कर सकते हैं अंतस आपका, जैसे करे धूप।
कभी अकेला मत समझो खुद को,
चाहे कुछ भी हो जाए।
सूरज का करो इंतजार।
बस, सूरज का करो इंतजार।
काले बादल तो उड़ ही जाते हैं।
मेरा पक्का वादा समझो।
आपके साथ हम सब भी कर रहे इंतजार।
बस, सूरज का करो इंतजार।

आज के पॉडकास्ट में शामिल की गईं विदेशी कवयित्रियों की सभी कविताएं अनूदित की हैं भुवेंद्र त्यागी ने. शुक्रिया उनका कि उनके जरिए हम उम्मीद से लैस इन खूबसूरत कविताओं से हिंदी से रू-ब-रू हो सके. वैश्विक दूरियां पाटतीं कविताओं से साहित्य की दुनिया रोशन रहे… इसी दुआ के साथ मैं पूजा प्रसाद आपसे विदा लेती हूं. जल्दी ही मिलूंगी आपसे कुछ और रचनाकारों के साथ… तब तक के लिए नमस्कार.



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