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SDG सूचकांक में बिहार फिसड्डी: जबतक बिहार ‘रुकतापुर’ बना रहेगा और सरकार-अफसरों का फायदा होता रहेगा

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नीति आयोग ने वर्ष 2020-21 के लिए सतत विकास लक्ष्य ( Sustainable Development Goal SDG) के मोर्चे पर राज्य सरकारों के प्रदर्शन की रैंकिंग जारी की है. इस रैंकिंग में केरल ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है तो बिहार ने सबसे ख़राब. 52 अंकों के साथ बिहार आख़िरी पायदान पर है जबकि 56 अंकों के साथ झारखंड और 57 अंकों के साथ असम उसके ऊपर हैं.

बिहार की दुर्दशा की यह कोई पहली कहानी नहीं है. सतत विकास लक्ष्य के मोर्चे पर पिछड़ा बिहार बहुत पहले से ही बीमारू राज्यों (BIMARU states) की लिस्ट में शीर्ष पर है.

पिछले वर्ष लॉकडाउन में पैदल ही देशभर से बिहार की ओर कूच करते लाखों प्रवासी मजदूरों की दिल दहला देने वाली तस्वीरों ने भी बिहार के हालात को एक बार भी सभी के सामने ला खड़ा कर दिया था.

किस्से-कहानियों में भी तंगहाल बिहार का जिक्र होना आम है. पिछले साल ही एक किताब आई थी ‘रुकतापुर’. ठहरे हुए बिहार की कहानी है बयां करती इस किताब की खूब चर्चा हुई थी. नीति आयोग के इंडेक्स में बिहार को निचले पायदान पर दिखाए जाने से ‘रुकतापुर’ का फिर से जिक्र करना लाजिम हो जाता है.

इतिहास में महान राजा, दार्शनिक, शिक्षक, साहित्यकार और विद्वान देने वाला यह राज्य आखिर इतना पिछड़ा क्यों है. वर्तमान में भी देश को सबसे ज्यादा आएएएस-पीसीएस देने वाले बिहार की दशा में सुधार क्यों नहीं हो रहा है. दुनिया को शांति और प्रेम का संदेश देने वाले भगवान बुद्ध की नगरी में इतनी उथल-पुथल क्यों मची हुई है.

इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिए हम फिर से पत्रकार और लेखक पुष्यमित्र की किताब ‘रुकतापुर’ के पन्ने पटलते हैं. ‘रुकतापुर’ राजकमल प्रकाशन के उपक्रम ‘सार्थक’ से छपकर आई थी. यह किताब एक रिपोर्टर की डायरी है जिसमें रिपोर्टर की पैनी दृष्टि विकास के सरकारी दावों को आईना दिखलाती है और सच्चाई सामने रखती है.

ठहरे हुए बिहार की कहानी है बयां करती है ‘रुकतापुर’

किताब का पहला अध्याय है ‘जा झाड़ के’. ‘जा झाड़ के’ बिहार में एक चर्चित लोकगीत की पंक्ति है. यहां लेखक राज्य के हालातों को इस सच्चाई के साथ रखता है कि वह हमें झाड़ कर जाने नहीं देता, बल्कि झटककर रोक लेता है. लेखक लिखता है अपना राज्य – रुकतापुर – बन गया है. यहां चेन पुलिंग कर सिर्फ ट्रेनें ही नहीं रोकी जातीं, बल्कि विकास की तमाम संभावनाओं की भी चेन पुलिंग कर ली जाती है.

किताब में लेखक बाढ़ से आई तबाही और गुम होते तालाबों की कहानी बयान करता है. बाढ़ के हालात पर पुष्यमित्र लिखते हैं कि गांव तो गांव, शहर भी बदहाल हो गए थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाढ़ग्रस्त इलाके का हवाई दौरा किया था और बाद में कहा था कि यह ‘फ्लैश फ्लड’ है.

नीतीश का बयान मीडिया में चला था – फ्लैश फ्लड आ गया था. हम चेत नहीं पाए. अचानक पानी आ जाए तो कोई क्या कर सकता है!

पुष्यमित्र लिखते हैं, किसी ने नहीं पूछा कि जिस महानंदा का पानी चार रोज पहले सिलीगुड़ी और उत्तर बंगाल में तबाही मचा रहा था, उसे आना तो बिहार के रास्ते किशनगंज, कटिहार और पूर्णिया जिले में ही था. आपको तो चार रोज पहले ही सतर्क हो जाना चाहिए था. जिस गंडक का पानी एक हफ्ते से नेपाल को तबाह किए हुए था, वही पानी तो बगहा और बेतिया और आसपास के इलाके में पहुंचा है. इसे फ्लैश फ्लड क्यों कहते हैं?

लेखक कहते हैं कि जिस राज्य में बाढ़ का इतना पानी हर साल आता है कि गांव-के गांव डूब जाते हैं, शहरें बदहाल हो जाती हैं, उसी राज्य में गर्मी के दिनों में पीने के पानी का संकट पैदा हो जाता है. इसकी वजह बताते हुए वो लिखते हैं कि इस राज्य के तालाब गुम होते जा रहे हैं. लोगों ने उसे भर दिया है. सरकार भी सहयोगी रही है. तालाब भर कर, नदियों के तट पर कब्जा कर बस्तियां बसाई जा रही हैं. सरकार और यहां रहने वाले लोग पानी से हो रही हत्या भी झेल रहे हैं साथ ही पानी की भी हत्या कर रहे हैं.

रुकतापुर में किसानों की दुर्दशा, बटन उद्योग, सोनपूर मेला और सरकारी धोखे की कहानियां हैं. पुष्यमित्र बताते हैं कि तरारी जाने के रास्ते में एक गांव से गुजरते हैं जिसका नाम है धनछुआं. वे बताते हैं कि उस गांव का नाम इसलिए धनछुआं पड़ा है कि वहां धान की पैदावार बहुत होती है. पर उन्हें इस गांव में एक अजब दृश्य दिखता है. वे बताते हैं कि सड़क किनारे एक घर के दरवाजे पर सैकड़ों बोझे धान के पड़े हैं. उन बोझों में धान की बालियां साफ नजर आ रही थीं. पूछने पर किसान बबन ने बताया ‘क्या करें. सोच रहे हैं, पैक्स वाला खरीदने का वादा करेगा तो दौनी कराएंगे. नगीं चो ऐसे ही छोड़ देंगे. दौनी कराने में भी कम पैसा थोड़े ही लगता है. अगर रेट नहीं मिलेगा तो इसमें पैसा काहे लगाएंगे?’

एक किसान ने कहा ‘भोजपुर जिले के सभी पैक्स संचालकों ने मिलकर फैसला किया है कि किसानों को 1200 रुपए से अधिक का रेट नहीं देना है. सरकार अलग रेट तय करती है, पैक्स अलग. सरकार कहती है कि किसान को धान की सही कीमत दे रहे हैं, मगर खरीद मूल्य का बड़ा हिस्सा पैक्स संचालक और बिचौलिया हड़प लेता है. इसलिए सबसे अच्छा होगा कि पैक्स को ही बंद कर दिया जाए.’

किताब की कहानियां बतलाती हैं कि क्यों बिहार का दूसरा नाम रुकतापुर है. अगर यहां विकास अगर रुका है तो उसकी एक बड़ी वजह सरकार की कमजोर इच्छा शक्ति भी है, लेकिन उससे ज्यादा दोषी वह सरकारी वर्क कल्चर है जो अपनी ओछी मानसिकता से बाहर नहीं आना चाहता. दरअसल, राज्य जबतक रुकतापुर बना रहेगा तबतक सरकार और उनके अफसरों का निजी फायदा होता रहेगा.

किताब – रुकतापुर

लेखक– पुष्यमित्र

प्रकाशन– राजकमल प्रकाशन



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