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Shayari: ‘ख़ुद को गंवा के कौन तेरी जुस्तुजू करे’, मुहब्‍बत से लबरेज़ अशआर…

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Shayari: शायरी में दिल की बात लबों पर आती है. या कहें कि शायरी हाले-दिल बयां करने का एक खूबसूरत ज़रिया है. शेरो-सुख़न (Shayari) की इस दुनिया में हर जज्‍़बात को बेहद ख़ूबसूरती के साथ काग़ज़ पर उकेरा गया है. बात चाहे इश्‍क़ो-मुहब्‍बत (Love) की हो या इंसानी जिंदगी से जुड़े किसी और मसले पर क़लम उठाई गई हो. शायरी में हर जज्‍़बात (Emotion) को ख़ूबसूरती के साथ तवज्‍जो मिली है. यही वजह है कि कहीं इसमें मिलन की दिलकशी है, तो कहीं जुस्‍तजू का चर्चा. महबूब की तलाश में शायर में कितने ही इश्‍क़ भरे अफ़साने क़लमबंद कर डाले और काग़ज़ पर उतर कर ये अशआर में ढल गए. शायरों के ऐसे ही बेशक़ीमती कलाम (Kalaam) के कुछ ख़ूबसूरत रंग यहां पेश हैं. इनमें शायर की जुस्‍तजू का जिक्र है और इश्‍क़ की बात की गई है. आप भी इन बेशक़ीमती अशआर का लुत्‍़फ़ उठाइए…

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ऐ शख़्स मैं तेरी जुस्तुजू से

बे-ज़ार नहीं हूं थक गया हूं

जौन एलिया

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सब कुछ तो है क्या ढूंढ़ती रहती हैं निगाहें

क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूं नहीं जाता

निदा फ़ाज़ली

जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने

इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हम ने

शहरयार

पा सकेंगे न उम्र भर जिस को

जुस्तुजू आज भी उसी की है

हबीब जालिब

जुस्तुजू करनी हर इक अम्र में नादानी है

जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है

इमाम बख़्श नासिख़

तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी

ख़ुद को गंवा के कौन तेरी जुस्तुजू करे

अहमद फ़राज़

है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहां

अब ठहरती है देखिए जा कर नज़र कहां

अल्ताफ़ हुसैन हाली

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खोया है कुछ ज़रूर जो उसकी तलाश में

हर चीज़ को इधर से उधर कर रहे हैं हम

अहमद मुश्ताक़ (साभार/रेख्‍़ता)

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